सफ़र की यादें
सफ़र की यादें एक भावुक प्रेम कविता है, जो पुराने रिश्तों, अधूरे वादों, समय की विडंबना और बिछड़ने के बाद रह जाने वाली यादों को अभिव्यक्त करती है।

सफ़र की यादें एक भावुक प्रेम कविता है, जो पुराने रिश्तों, अधूरे वादों, समय की विडंबना और बिछड़ने के बाद रह जाने वाली यादों को अभिव्यक्त करती है।
संध्या यादव, मुंबई सुनो जान… लोग कहते हैं, थके शरीर को नींद पत्थर पर भी आ जाती है और ऐसी ही गाढ़ी कमाई वाली नींद को मिलते हैं सपने… लोग ये भी कहते हैं कि सुबह के सपने सच होते हैं। मुझे नींद तो नहीं आई, मगर अक्सर झपकी लगी। ट्रेन में हैंडल पकड़े, एक…
विजया डालमिया, हैदराबाद ‘साथ हो तुम मेरे’ कनिका की कहानी है, जिसे प्रेम मिला तो सही, लेकिन स्वीकार नहीं मिला। सांवले रंग को लेकर मिले अस्वीकार ने उसे भीतर तक तोड़ दिया, मगर उसने अपने प्रेम को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। कपिल उसके जीवन में साथ होकर भी साथ नहीं था, फिर भी उसकी…
कुछ तो छोड़ते जाते” एक भावनात्मक कविता है, जो बिछड़ते रिश्तों की टीस, अधूरे वादों और प्रेम में मिले विरह को संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। हर पंक्ति में यादों, तन्हाई और टूटे विश्वास का दर्द झलकता है। कविता केवल बिछड़ने की पीड़ा नहीं, बल्कि उन अनकहे सवालों की भी अभिव्यक्ति है जो हर अधूरी प्रेम कहानी के साथ हमेशा जीवित रहते हैं।
“पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो…” प्रेम, इंतज़ार, तन्हाई और अधूरी चाहत की पीड़ा को व्यक्त करती यह कविता दिल की गहराइयों को छू जाती है। मन्नत के धागे से शुरू होकर प्रेम के दर्द तक की भावनात्मक यात्रा का मार्मिक चित्रण।
यह कहानी प्रेम, नियति और विश्वास की ऐसी यात्रा है, जहाँ अतीत और वर्तमान टकराते नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझकर स्वीकार कर लेते हैं।
जब कोई मिलने आए, तो वह अधूरा नहीं, पूरा होकर आए—यही इस कविता का मूल भाव है। यह रचना बताती है कि आधे मन और बंटी हुई भावनाओं के साथ सच्चा समर्पण संभव नहीं होता। प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें किसी प्रकार की कमी या विभाजन न हो।
तूफ़ान मेल की छुक-छुक के बीच अचानक अर्जुन की नज़र एक जानी-पहचानी खुशबू पर ठहरी वह निशा थी। छह वर्षों का सन्नाटा पलभर में टूट गया। उम्र की सफेदी बालों में उतर आई थी, पर भावनाओं की गरमी अब भी वही थी। कॉलेज के दिनों का प्रेम, एक गलती से टूटा संबंध, और फिर ट्रेन में यूँ अनायास मिलना.दोनों के भीतर दबा हुआ प्यार फिर से जाग उठा। आधी रात की लंबी बातचीत के बाद अर्जुन ने हाथ बढ़ाया-“मेरे साथ उतरना चाहोगी?” निशा ने बिना झिझक अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। पुराने ग़िले धुल गए थे; दो अकेली ज़िंदगियाँ फिर से एक-दूसरे को पा चुकी थीं।