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मन्नत का धागा

पेड़ तो वही है, पर तुम बदल गए हो

श्वेता सिंह, मुंबई

तुम्हारी चाहत में जो हमने
मन्नत का धागा बाँधा था
उस बरगद के पेड़ पर,
पेड़ तो वही है,
पर तुम बदल गए हो।

चाहत क्यों इतनी अज़ीज़ होती है,
कि उसमें बेइज़्ज़ती ही नसीब होती है।
धागा बाँधते वक्त
तुम्हारा चेहरा बहुत याद आया था,
तुम्हें मन-ही-मन
हमने अपना खुदा बनाया था।

मिलकर तुमसे
इस कदर खुश होती हूँ,
तुम पास न हो तो
तुमसे ख़यालों में बात करती हूँ।

तेरे पास आने का
हर बहाना ढूँढ़ती हूँ,
तुम दूर न हो जाओ मुझसे,
बस इसी बात से डरती हूँ।

तुम्हारी आँखों में
प्यार दिखता है मुझे,
ये मेरा वहम है
या सचमुच तुम भी चाहते हो मुझे।

मैं तुमसे दूर रहकर भी
परेशान हो जाती हूँ,
तुम पास होते हो
तो भी दिल का हाल न बता पाती हूँ।

अब तो तुम्हारे बिना
जीना गवारा नहीं मुझे,
वक्त की तन्हाइयों ने
अंदर ही अंदर मार दिया है मुझे।

इश्क़ को जन्नत
क्यों बना देते हैं लोग,
जन्नत न मिले
तो खुद को मिटा देते हैं लोग।

प्यार बहुत बेरहम होता है,
फिर जानकर भी क्यों करते हैं लोग?
ज़िंदगी से बढ़कर
प्यार तो नहीं होता,

फिर इस प्यार को पाने की ख़ातिर
ज़िंदगी ही ख़त्म कर देते हैं लोग।

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