खिड़की के पास बैठा व्यक्ति, मन की थकान और अकेलेपन को दर्शाता दृश्य

“मन थके तो कौन?”

मन की थकान वह पीड़ा है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। “मन थके तो कौन?” कविता इसी अदृश्य दर्द को उजागर करती है, जहाँ तन की बीमारी का इलाज तो मिल जाता है, लेकिन मन के घाव केवल एक सच्चे अपने की उपस्थिति से ही भरते हैं। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा सहारा सिर्फ सुनने वाला एक दिल होता है।

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अकेलेपन और प्रेम को दर्शाता थिएटर सीन”

नेपथ्य और रंगमंच

यह कविता जीवन को एक रंगमंच के रूप में प्रस्तुत करती है, जहां हर व्यक्ति एक किरदार निभा रहा है। कवयित्री स्वयं को मंच पर उपस्थित बताती है, जहां वह अपने भावों, पीड़ाओं और प्रेम को खुलकर जी रही है, जबकि उसका प्रिय नेपथ्य में रहकर अपने अस्तित्व को छिपाए हुए है।

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