मेरी अर्थी पर फिर मत आना

जनाज़े में मत आना तुम

जो तुमने साँसों के चलते हाल नहीं जाना,
तो मेरी अर्थी पर फिर मत आना तुम।

जब ज़िंदा थे तब साथ निभा न सके,
अब रस्म-ए-वफ़ा यूँ मत निभाना तुम।

हर दर्द को हमने हँसकर छुपा लिया,
अब अश्कों से किस्सा मत जताना तुम।

हमने पुकारा था तुम्हें हर सन्नाटे में,
अब महफ़िल में नाम न दोहराना तुम।

जब दिल की धड़कनों ने तुम्हें चाहा था,
तब ख़ामोश थे… अब गुनगुनाना मत आना तुम।

वक़्त ने जब हमको तन्हा कर दिया,
अब भीड़ में साथ दिखाने मत आना तुम।

तेरी बेरुख़ी ने जो ज़ख़्म दिए दिल को,
अब उन पर मरहम बनकर मत आना तुम।

हमने तो तेरे नाम पे दुनिया छोड़ी थी,
अब दुनिया लेकर सामने मत आना तुम।

जब टूट के बिखरे थे हम तेरी चाहत में,
तब हाथ न थामा… अब थामने मत आना तुम।

तेरे वादों की हर इक डोर टूट चुकी,
अब नए वादों का जाल बिछाना मत आना तुम।

हमने अंधेरों में भी रौशनी ढूंढ ली,
अब चराग़ बनकर राह दिखाना मत आना तुम।

दिल ने बहुत चाहा तुझे आख़िरी दम तक,
अब कब्र पे फूल चढ़ाने मत आना तुम।

“निधि” ये इश्क़ भी अजीब इम्तिहान निकला,
जब जीते-जी न मिले, तो जनाज़े में मत आना तुम।

3 thoughts on “मेरी अर्थी पर फिर मत आना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *