
गौसिया परवीन, बिजनौर
एक रोज
मृत्युलोक में नारद जी
विचरण करने आए।
आकर उन्होंने महंगाई को देखा,
देखा यहाँ सभी चीज़ों पर
महंगाई का सरमाया है।
हर वस्तु का दाम उसने
आसमान तक पहुँचाया है।
देख इतने दामों को
नारद जी थोड़ा घबराए।
फिर महंगाई से बोले-
“क्यों री महंगाई!
हर वस्तु का दाम तूने
क्यों इतना बढ़ाया है?
यहाँ तो महंगी हो गई रोटी-दाल,
अब तो बचे हैं बस सिर के बाल!
कैसे व्यक्ति कोई वस्तु खरीद पाएंगे?
ऐसे तो गरीब भूखे ही मर जाएंगे!”
सुनकर नारद जी की बात
महंगाई थोड़ी शर्माई,
मुस्कुराई और बोली
“ऐ नारद भाई!
क्यों है तेरे मन में
इतनी नाराज़गी समाई?
क्यों देता है तू मुझे
गरीबी की दुहाई?
मैंने तो किया वही
जो मुझसे कहा गया है,
मैं तो मात्र मोहरा हूँ,
इसमें नहीं है मेरी कोई फरमाइश।
तो फिर तू
क्यों करता है मेरी रुसवाई?”
“धर्म है पालन करना मेरा,
हुक्म जो मिला है।
शिकायत करनी है,
तो उनसे करो
जिनके पास सत्ता है।
करेंगे यदि वे नियंत्रण,
तो मैं काबू में आऊँगी।
बिना कहे ही आपके
यहाँ से चली जाऊँगी।”
“किन्तु तब तक ऐसे ही
बढ़ती रहूँगी,
यहाँ से कहीं न मैं जाऊँगी।
जाओ! आप भी अपने लोक,
हमें भी काम आया है।
मिलेंगे फिर कभी,
यदि किस्मत ने चाहा है।”
सुनकर महंगाई की ये बातें,
निराशा नारद जी पर छाई।
चले गए वे कहते हुए
अपने लोक
“हाय महंगाई! हाय महंगाई!”
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बहुत सुंदर व्यंग्य कविता
Yes! बहुत ही सुन्दर 👌👌
👍👍👍👍👍
Bahut hi sundar rachna ❤️❤️❤️❤️🔥🔥
Bahut hi sunder aur vyangyatmak kavita hai 👏👏👏
Wahhhh! Bhut sunder 👌👌👌👌