बंगाल की चुनावी रैली
बंगाल की चुनावी रैली एक व्यंग्यात्मक कविता है, जिसमें चुनावी नारों, राजनीतिक टकराव, जनभावनाओं और बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रोचक एवं मंचीय अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।

बंगाल की चुनावी रैली एक व्यंग्यात्मक कविता है, जिसमें चुनावी नारों, राजनीतिक टकराव, जनभावनाओं और बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रोचक एवं मंचीय अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।
“एक मध्यमवर्गीय की दास्तान” भारतीय मध्यमवर्ग के संघर्ष, महंगाई और बदलते सामाजिक परिवेश पर तीखा लेकिन संवेदनशील व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में सोना, रोजमर्रा की जरूरतें और आधुनिक जीवनशैली के बीच पिसते आम इंसान की स्थिति को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।
यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।
यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।