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कोलकाता में आयोजित एक विशाल चुनावी रैली का दृश्य, जहाँ बड़ी संख्या में लोग राजनीतिक झंडों और बैनरों के साथ नेताओं का संबोधन सुन रहे हैं। चुनावी माहौल, जनउत्साह और लोकतांत्रिक गतिविधियों को दर्शाता यथार्थवादी चित्र।

बंगाल की चुनावी रैली

बंगाल की चुनावी रैली एक व्यंग्यात्मक कविता है, जिसमें चुनावी नारों, राजनीतिक टकराव, जनभावनाओं और बंगाल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रोचक एवं मंचीय अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है।

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महंगाई और आर्थिक संघर्ष से जूझते भारतीय मध्यमवर्ग को दर्शाती व्यंग्य कविता की यथार्थवादी छवि।

एक मध्यमवर्गीय की दास्तान

“एक मध्यमवर्गीय की दास्तान” भारतीय मध्यमवर्ग के संघर्ष, महंगाई और बदलते सामाजिक परिवेश पर तीखा लेकिन संवेदनशील व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कविता में सोना, रोजमर्रा की जरूरतें और आधुनिक जीवनशैली के बीच पिसते आम इंसान की स्थिति को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।

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महंगाई से परेशान आम आदमी और बढ़ती कीमतों का प्रतीकात्मक दृश्य

बढ़ती महंगाई

यह कविता नारद जी और महंगाई के संवाद के माध्यम से समाज की विडंबना को उजागर करती है। महंगाई खुद को निर्दोष बताती है और असली जिम्मेदारी सत्ता और व्यवस्था पर डालती है जो इस व्यंग्य को और भी प्रभावशाली बनाता है।

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किसको ढोओगे

यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।

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