
बंगाल का चुनावी दंगल था कोलकाता,
जो कभी दुर्गा-पूजा का गढ़ था,
वहाँ अब राजनीति का नया ‘मढ़’ था।
एक तरफ़ ‘इंकलाब’ की पुरानी यादें थीं,
दूसरी तरफ़ ‘मुमताज बेगम’ की नई मुरादें थीं।
चर्चा तो बस ‘मोचा’ और ‘गुड़गुड़’ की चाय पर थी,
पर बहस अब सीधे चुनावी चौधराहट पर थी।
सनातनियों का पारा अचानक चढ़ने लगा,
हर गली, हर चौराहे पर भगवा बढ़ने लगा।
पार्क स्ट्रीट से लेकर दमदम के मैदान तक,
वादे गूँज रहे थे पाताल से आसमान तक।
कहीं ज़ोर-शोर से चुनाव का प्रचार था,
तो कहीं सायानी घोष का सुर-ताल तैयार था।
तभी सफेद साड़ी और हवाई चप्पल वाली ‘दीदी’ पधारीं,
नारा गूँजा-
“देखो-देखो, एक नारी सब पर भारी!”
दिल्ली वाले बोले—
“अबकी बार ब्रह्मपुत्र पार!”
पर दीदी का इरादा था,
सब पर करना पलटवार।
चुनावी रंग में पूरा बंगाल सराबोर था,
हर नुक्कड़ पर नारों का भारी शोर था।
चाणक्य की सेना ने नारा लगाया—
“अबकी बार, दो सौ पार!”
बंगाल की जनता भी
देखने लगी यह चमत्कार।
तभी बंगाल की बेगम का माइक पर गुस्सा आया,
‘की बोले?’ कहकर उन्होंने
पूरा मंच हिलाया।
वो बोलीं
“हम सब भाषा समझते हैं,”
और फिर शुरू हुआ वो राग,
जिसे सुनकर सब हँसते हैं—
“हंबा-हंबा, रंबा-रंबा,
बुम्बा-बुम्बा, कूंबा-कूंबा!”
इस अनोखे व्याकरण में ही
उलझकर रह गई बंगाल की ‘क्वीन’।
रवींद्रनाथ की पावन और ज्ञानमयी धरती पर,
टीएमसी जब व्यस्त थी
चुनावी ‘खेला’ करने पर,
तभी भगवा का परचम कुछ यूँ लहराया,
कि दिल्ली का हर सूरमा
बंगाल खिंचा चला आया।
फिर क्या था
रसगुल्ले की मिठास पर
जय श्रीराम का तीखा तड़का लग गया।
हुगली की लहरों और
हर चौराहे की शांत धारा पर,
बस एक ही नारा
गूँज-गूँज कर छा गया
दीदी के ‘हंबा-हंबा’ पर
भारी पड़ गया
“जय श्रीराम! जय श्रीराम!!”
