
मंजूलता, नोएडा
तुम मुझे भूलना चाहते हो,
यादों से किनारा करना चाहते हो।
कर पाओगे?
कहाँ-कहाँ यादों से पीछा छुड़ाओगे?
बाथरूम में जाओगे,
दर्पण पर लगी बिंदी
मेरी याद दिलाएगी।
किचन में जाओगे,
पहले की तरह आवाज़ लगाओगे—
“बताओ न, किस डिब्बे में चाय है,
और किसमें चीनी?”
पर उत्तर नहीं मिलेगा,
और तुम मायूस हो जाओगे।
किताबों की अलमारी के पास जाकर
ठिठक जाओगे,
मेरी पसंदीदा पुस्तक को देखकर
तुम्हारी आँखें भर आएँगी।
दफ़्तर जाते समय
जब फाटक खोलोगे,
तब तुम्हें आभास होगा
मेरी मौजूदगी का।
जैसे हर रोज़
हाथ हिलाकर,
हवा में चुम्बन उछालकर
मैं तुम्हें विदा किया करती थी।
संभव है कि
तुम मुझे भूल जाओ,
पर…
इस संभावना को लेकर
मैं आज भी सशंकित हूँ।
