
डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई
उस रोज़ भी तमाशा क्या ख़ूब होगा,
फ़िज़ा में इश्क़ का फैला सुरूर होगा।
चारों तरफ़ अँधेरा ही अँधेरा होगा लेकिन,
मेरे चेहरे पर तेरा ही नूर होगा।
चाँद भी देखकर हैराँ-सा रह जाएगा,
तेरी प्रीत का ऐसा सरूर होगा।
तेरी यादों की शमा यूँ जलेगी दिल में,
रात का हर एक मंज़र पुरनूर होगा।
लब ख़ामोश रहेंगे तो कोई ग़म न होगा,
आँखों से दिल का हर जज़्बा ज़रूर होगा।
लोग पढ़ लेंगे निगाहों से मोहब्बत अपनी,
इश्क़ महफ़िल में उस दम मशहूर होगा।
जब मिलोगे तुम हमें महफ़िल-ए-तन्हाई में,
हर एक लम्हा बहुत ख़ास और नूर होगा।
‘निधि’ उस रोज़ तेरी शायरी का आलम देख,
हर किसी के लबों पर तेरा ज़िक्र ज़रूर होगा।
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