
सीलन से लदी देह,
पर कोई नहीं डालता
अपनी आत्मबोध का अहसास।
सुलगते यौवन के आलिंगन से
झुलसती देह के फफोलों को
समेटने की बेक़रारी में,
जहाँ आत्मा की गीली अँगीठी से
धीरे-धीरे बुझता जा रहा है
दलदल में जलता हुआ
“देह-कमल।”
रसातल की जड़ों को कुरेदती,
जिह्वा से उपजी
यथार्थ की तीखी लौ,
सतलुज की जलधार
से कट रही है शिला की परत-दर-परत,
जैसे अभिलेखों में दृष्टिगोचर हो रहे
भँवर में समाते किनारों के
ठहरे हुए ठिकाने।
पत्थरों के समर्थ प्राणबल से
अपने ही अस्तित्व का अर्थ खोजती,
एक मौन चित्कार
की कराहती बेड़ियों
में जकड़ती जा रही
तन्हाई की उबलती तासीर।
अलविदा…
घुट रहा ममत्व
तन से,
मन से।
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