
डॉ. मीरा कनौजिया
स्वर्णिम प्रभात ले आया, सुंदर भोर की बेला,
पीतवर्ण स्वर्णिम रश्मियाँ, हिल-मिल करती खेला।
पूर्व दिशा में फैल गई रक्तिम वर्ण की लालिमा,
उषा नायिका सजी ओढ़नी, धारण कर पीतिमा।
भोर की बेला हुई, चंचल चकोर अब सो गया,
पीतवर्ण की आभा से जग आभामंडित हो गया।
पक्षी कलरव कर रहे, चहचहा रही हैं चिड़ियाँ,
पुष्प प्रफुल्लित हो रहे, धीरे-धीरे खिलती कलियाँ।
सरोवर-तालाबों में प्रतिबिंबित हो रहा नील नभ,
आम्र-मंजरियों पर कोयल कूके, कुहू-कुहू कलरव।
आमोद-प्रमोद में मग्न सभी वन्य जीव-प्राणी,
स्वर्णिम प्रभात की बेला में गूँजे गुरुओं की वाणी।
आओ सुंदर प्रकृति का हम सब स्वागत करते हैं,
प्रकृति है अनमोल संपदा, इसका संरक्षण करते हैं।
फल, फूल और पौधे हैं प्रकृति के अनुपम उपहार,
प्रकृति-संरक्षण कर करें हम नैसर्गिक कल्याण।
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