
डॉ. शशिकला पटेल, असिस्टेंट प्रोफेसर, मुलुंड पूर्व (मुंबई)
बनती कभी मीत, कभी करती है गिला,
एहसास दिलकशी का तुझसे ही मिला।
सिखाती कभी प्यार, तो मिलाती गुरूर से,
ऐ ज़िंदगी, रोक दे कशमकश का ये सिलसिला।
हर मोड़ पर लेती है तू नए इम्तिहां,
कभी आँधियों के थपेड़े, कभी दर्द का कारवां।
एक चाँद का टुकड़ा, एक मुट्ठी आसमां,
समेट लूँ पर्स में, कुछ वक़्त तो दिला।
उलझनों के बीच भी, तेरा ही सहारा है,
खुशियों की चादर में, दर्द ने पाला बिछाया।
सपनों के परिंदे अब भी उड़ान भरते हैं,
जरा-जरा से ज़ख्मों का बन गया है काफ़िला।
ऐ ज़िंदगी, तू ही साज़, तू ही मेरी सदा,
तेरे संग जिया है, तुझमें ही पाया खुदा।
हर लम्हा नया हो, हर दर्द को सहा,
अब बस कर, थोड़ा हसीं का गुल खिला।
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बेहतरीन कहानी
वाह बहुत सुंदर