ज़िंदगी
राज़-ए-ज़िंदगी
यह ग़ज़ल ज़िंदगी के रहस्यों, प्रेम और अस्तित्व के गहरे एहसासों को बयां करती है। कवि ने “किताब-ए-ज़िंदगी” के रूपक के माध्यम से जीवन के अनसुलझे प्रश्नों और भावनाओं को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। हर शेर जीवन के एक नए पहलू को उजागर करता है।
ज़िंदगी के नाम एक ख़त
ज़िंदगी के नाम लिखा गया एक आत्मीय ख़त है, जिसमें जीवन की सुंदरता और कठिनाइयों दोनों को स्वीकारते हुए, उससे साथ निभाने और हर हार में संबल देने की विनती की गई है।
नियति से बहस नहीं
शैफाली सिन्हा, नवी मुंबई (महाराष्ट्र) बचपन से ही मैंनेख़ुद को पीछे रखकरसबकी सेवा की।लोग आश्वासन देते रहेइसका फल ज़रूर मिलेगा। फल की कभी चाह नहीं रही,बस कोई स्नेह सेदो मीठे बोल कह देतो वही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन जाते। शायद यही मेरी नियति थी,या शायद मेरा होना हीकिसी और का सहारा बनने के लिए…
तलाश
ज़िंदगी में तलाश रास्तों की नहीं, मंज़िल की होती है। इंसान कभी-कभी जीवन की भीड़ में इतना आगे बढ़ जाता है कि खुद से ही दूर हो जाता है। सुख चैन नहीं लेने देता और दुख नींद छीन लेता है, पर हम मुस्कुराते हुए सब झेलते हैं जैसे बेफ़िक्री में गुज़र रही ज़िंदगी को बस देखते जा रहे हों। असल खोज जीवनभर खुद को पाने की ही रहती है।
दर्द
वक्त ने हमसे कई अपने छीन लिए, वरना हमारा कारवां भी कभी बड़ा हुआ करता था। हमने भी कभी रेत पर सपनों के रंगों से शब्द लिखे थे, पर लहरों का जोर इतना था कि सब मिट गया। भयानक आंधियों में भी आसमान तो ठहरा रहा, मगर पंछियों की चोंच खाली थी। जिसे अपने हुनर पर पूरा भरोसा था, वही शहर की बिगड़ी हवा में गुम हो गया। जिस पेड़ ने जिंदगी भर छाँव दी, उसी पेड़ से उसने रिश्ता तोड़ लिया। जो हमेशा दूसरों की थालियाँ भरता रहा, आज उसकी अपनी थाली खाली है। अब उसने आसमान की फिक्र छोड़ दी है . बस ज़मीन को सिर पर उठाकर आगे बढ़ना सीख लिया है।
अंधेरे …
यह कविता जीवन की अंधेरी राहों में प्रेम, परिवार और आत्मबल की रोशनी तलाशती है। कवि कहता है. अंधेरे चाहे कितना भी घेर लें, हम एक-दूसरे को छोड़कर नहीं जाएंगे। थकी हुई आत्मा को सहारा देने के लिए सच्चा प्रेम ही पर्याप्त है। रिश्तों की डोर अगर प्यार से जोड़ी जाए तो परिवार हमेशा साथ रहता है। समय के कठिन क्षणों में सब साथ छोड़ जाते हैं, फिर भी प्रेम और आशा के सितारे जगमगाते हैं।
मैं कैसे हार मान लूं…
यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”
त्योहार पर घर
घर जाने का नाम आते ही उसके भीतर एक अजीब-सा डर जाग उठता है। डर किसी अनजान रास्ते का नहीं, बल्कि एक बहुत परिचित सवाल का है—
“क्या करते हो आजकल?”यही सवाल उसकी हिम्मत तोड़ देता है। यही वजह है कि वह एक और त्योहार भी अपने छोटे से कमरे में बिताने को मजबूर हो जाता है।उसके चारों ओर बिखरी रहती हैं कुछ पुरानी किताबें, कुछ बर्तन, मेज़ पर रखा टेबल लैंप और कोनों में धुंधले पड़ते सपनों की परछाइयाँ। इन्हीं सबके बीच वह सोचता है कि क्या उसे एक और साल की मोहलत खुद को देनी चाहिए या फिर चुपचाप उन सपनों को यहीं छोड़ देना चाहिए।
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