
स्मिता, प्रसिद्ध लेखिका, रांची
हर्फ़ बा हर्फ़ पढ़ा है अब तक
किताब ए जिंदगी मैंने तुझे
क्यों समझ आके भी नहीं आती
राज ए जिंदगी बताना मुझे
आंखें नम होंठ मुस्कुराते हैं
फलसफा जिंदगी सिखाना मुझे
तेरी सूरत बसी है नज़रों में
ख्वाब में आ मैं छुपा लूं तुझे
क़दम दर क़दम साथ चलते हैं
रास्ता तू जरा बता दे मुझे
उम्र की शाम ढलने आयी है
चैन की नींद अब सुला दे मुझे
मौत के बाद भी रहूं जिंदा
‘स्मिता’ छोड़ कुछ निशां ऐसे
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