
प्रातः-प्रभाती समर्पित है मरीचि को,
प्राण-पुलकित भरती रश्मि प्रचीति को।
रज-रज, कण-कण को देती नव श्वास,
वसुधा को पुनर्जीवित करती प्रतीति को।
नव-पल्लव, कली-कुसुम में भरे सौरभ,
ऊष्मा भरी किरणें रूप देती प्रकृति को।
खग-विहग का किलोल, जैसे गूँजी सरगम,
वंदन-स्पंदन आनंद कराती अनुभूति को।
नित्य-क्रम तुम निभाते, दिनकर! निष्ठा से,
भाव-समर्पण हमारा इस कर्तव्य-जागृति को।
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