इश्क़: पहली सांस भी, आख़िरी भी

नदी किनारे बैठे एक युवक और युवती के बीच भावनात्मक बातचीत और प्रेम का शांत दृश्य

मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका

“देख रहा हूँ, आजकल नए दोस्त से गाढ़ी छन रही है तुम्हारी!”
बोलते हुए उसने नदी में एक कंकरी फेंकी और जलतरंगों को देखने लगा।

“ओहो! जलन!”
लड़की ने बैठे-बैठे अपने दोनों घुटने जोड़े और हाथों को फँसाकर झूलने लगी, जैसे यह सुनकर उसे बड़ा आनंद आया हो।

“जलन नहीं, पर मुझे आभास हो रहा है कहीं ये मित्रता इश्क़ के रास्ते तो नहीं मुड़ रही!”

“अच्छा…, और अगर मुड़ रही हो तो?”

“तो… मैं सारी उम्र इस भुलावे में गुज़ार दूँगा कि ये बस अफ़वाह भर है तुम मुझसे ही प्रेम करती हो!”

“सच को अफ़वाह कैसे मान लोगे?”

“वैसे ही, जैसे तुम्हें मान लिया है… ईश्वर से बढ़कर!”

“हम्म…”
उसने प्यार से लड़के की आँखों में देखा और छेड़ते हुए बोली “बुद्धू समझेंगे लोग तुम्हें!”

“समझने दो! वैसे, क्या लगता है तुम्हें अभी नहीं समझते होंगे लोग मुझे बुद्धू? जो इश्क़ में पड़ते हैं, उन्हें आधी दुनिया बुद्धू ही समझती है!”

“और फिर भी पड़ ही जाते हैं लोग इश्क़ में!”
वो हँसी।

“नहीं पड़ते! इतना आसान थोड़े है किसी के प्रेम में पड़ना, उसे निभाना!”

“इसमें इतना भी क्या मुश्किल? पूछने चलो तो हर तीसरा इंसान किसी-न-किसी के इश्क़ में पड़ा होता है।”

“ना! वो लगाव होता है, प्रेम नहीं! लगाव और प्रेम में अंतर है। कभी-कभी हम किसी के आकर्षण में लंबे समय तक जड़ हो जाते हैं और उसे ही प्रेम समझ लेते हैं। लेकिन थोड़ी-सी दूरी सारे भ्रम तोड़ देती है। जब यूँ निकल जाता है वो हमारे ज़ेहन से…”
उसने हवा में चुटकी बजाते हुए कहा।

“ओह…”
वो थोड़ी मुरझा गई।
“फिर कैसे पता चलेगा प्रेम है या लगाव?”

“तब, जब किसी को जितना भूलने की कोशिश करो, वो उतना ही बेतरह याद आए। प्रेम उथला नहीं होता। अगर किसी से प्रेम करते हो, तो गल जाओ इसकी ताप में। वो मेरा है या किसी और का हो गया—इस चिंता में घुलते मत रहो। जिस दिन ये दहशत निकल जाएगी, प्रेम को लेकर सारे मिथक खत्म हो जाएंगे। प्रेम पीड़ा नहीं है, न कभी हो सकता है—प्रेम तो मरहम है… बेसुरे जीवन का मीठा आलाप!”

उसकी आँखों में हल्का-सा सीलापन उतर आया था।
“तुम्हारे मन में मुझे लेकर भय नहीं? डर नहीं लगता मेरे खो जाने का?”

“नहीं! मेरे जीवन का संगीत है ये। तुम्हारा एहसास बहुत वज़नी है। कभी खो भी जाओगी, तो भी अंतिम साँझ तक मेरे हृदय में अदृश्य चिड़ियों-सी चहकोगी। घुंघरू वाली चुनट कमर में खोंसे हुए साथ चलोगी मेरे जैसे अभी चलती हो… निश्चिंत हूँ!”

शब्द बिखर गए थे मध्य मौन मुखर था।

नदी के किनारों ने भरपूर रूमानियत की कई कहानियाँ सुनी थीं,
आज पहली दफ़ा मौन सुनकर अचंभित भी था और आनंदित भी…!
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