
रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई
आज मन उदास है। मुझे ठंड भी लग रही है। बारह घंटों तक पानी में जो खड़ा था। खैर, चिंता ठंड की नहीं है, उदास मन की है।
बहुत निराश हूँ।
ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन के लिए लालायित थे। उनका मेरे प्रति प्यार देखकर मैं अभिभूत था। इतनी भीड़ देखकर मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था। परंतु आज बारह घंटों तक पानी में खड़े रहने के पश्चात मुझे हकीकत का साक्षात्कार हुआ।
मैं ही लालबाग के मंडप में था और मैं ही गिरगांव चौपाटी पर। मंडप में लोग मेरे दर्शन करने के लिए लड़ रहे थे, धक्का मार रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे। सबको कतार में आगे जाना था। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
जो दर्शन नहीं कर पा रहे थे, वो दुःखी थे। मुझसे उनका दुःख देखा नहीं गया। तो मुझे एक युक्ति सूझी। मैंने सोचा क्यों न मैं ही अपने भक्तों को दर्शन दे दूँ, बिल्कुल आराम से, बिना किसी वाद-विवाद के, खुले आसमान और बहते पानी के बीच। बारह घंटों में चाहे जितने भक्त आ सकते हैं दर्शन करने—चाहे आम जनता हों या फिर वीआईपी हों।
पर ये क्या! मेरे भक्तों ने ही मुझे सच्चाई का अहसास करा दिया। भक्त चाहे पंडाल में दर्शन करने पहुँचे या फिर समुद्र किनारे—मेरा आशीर्वाद तो सभी के लिए एक समान ही रहता है। मैंने कभी अपने भक्तों में भेदभाव नहीं किया। अमीर-गरीब, जात-पात, ऊँच-नीच—ये सब तो इंसान द्वारा बनाए हुए कायदे-कानून हैं। उन्होंने अपने इस भेदभाव में मुझे भी शामिल कर लिया।
मेरे लिए तो सिर्फ एक ही भाव महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। मैं तो लालबाग पंडाल में भी वही एकदंत गजानन हूँ जो बाकी सभी पंडालों में और समुद्र किनारे पर हूँ। इंसानों ने पैसे के दम पर एक-दूसरे को तो खरीद ही रखा है, भगवान के अलग-अलग रूपों में भी भेदभाव कर रहे हैं। इंसान अपने आप को भगवान से ज्यादा ताकतवर समझने लगा है। उसे लगता है कि भगवान उसकी निजी संपत्ति है। वो भूल गया है कि भगवान ने उसे बनाया है, न कि उसने भगवान को। मैं इस बात से बहुत आहत हूँ, दुःखी हूँ।पिताजी मुझसे पूछ रहे थे, “गणेश, क्या हुआ? भक्तों ने तुम्हारा ध्यान तो रखा न? आज उदास लग रहे हो।”
मैं अपनी व्यथा पिताजी को नहीं बता सकता। मेरे भक्त महादेव का क्रोध सहन नहीं कर पाएँगे।
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रेनू , तुमने बहुत ही अच्छा लिखा है प्रयास जारी रखो ।
बहुत ही सुन्दर और मार्मिक लिखा है
😍😍😍
Very thoughtful and touching write up
Penned down very beautifully n touched.
Penned down very beautifully n touched.
सच है यह बहुत ही पीड़ादायक यथार्थ है इसके लिए कोई कदम उठाया जाना चाहिए देव .प्रतिमाओं का इस तरह अपमान और नदी तालाबों का प्रदूषण बंद होना चाहिए.
बहुत ही सुन्दर और मार्मिक लिखा है
अच्छा लिखा है , गणेश जी की पीड़ा बहुत गहरी है । विसर्जन मानव निर्मित है , बहुत धन , समय
और स्नेह से मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है । भारत के बहुत से घर , गांव इनको सादर रखने के लिए तैयार होंगे ।