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शब्दों की साधना, शिव की आराधना

इंदौर में साहित्यिक सम्मान प्राप्त करती कवयित्री, ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन की आध्यात्मिक यात्रा

सम्मान, साधना और दर्शन : मालवा की अविस्मरणीय यात्रा

नीलम पेड़ीवाल, जमशेदपुर (झारखंड)

कुछ यात्राएँ केवल स्थानों तक पहुँचने का माध्यम नहीं होतीं, वे आत्मा को स्पर्श कर जीवन की अमूल्य स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं। मेरे लिए 31 मई, 2026 का दिन ऐसा ही एक अविस्मरणीय दिवस बनकर आया, जिसने साहित्यिक उपलब्धि और आध्यात्मिक अनुभूति दोनों का अनुपम संगम मेरे जीवन में रच दिया।

30 मई को मैं अपनी सखी पूनम सिंह के साथ रेल यात्रा द्वारा इंदौर पहुँची। इंदौर में मेरी ननद का निवास है, अतः हम सबसे पहले उनके घर पहुँचे। थोड़े विश्राम के पश्चात हम इंदौर के प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन के लिए निकल पड़े। मंदिरों की दिव्य आभा, स्थापत्य की भव्यता और भक्तिमय वातावरण ने मन को अद्भुत शांति प्रदान की। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रत्येक मंदिर अपनी अनकही आध्यात्मिक कथा सुना रहा हो।

धार्मिक स्थलों के दर्शन के बाद हमने इंदौर के प्रसिद्ध सर्राफा बाजार का रुख किया। रोशनी से जगमगाता बाजार, चहल-पहल से भरी गलियाँ और वहाँ की जीवंत संस्कृति ने मन को अत्यंत आनंदित किया। इंदौर अपनी स्वच्छता और स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ के व्यंजनों का स्वाद आज भी मेरी स्मृतियों में ताज़ा है। विशेष रूप से इंदौरी पोहे की सादगी और स्वाद ने मन मोह लिया।

इंदौर प्रवास के दौरान मुझे धर्म और संस्कृति के अद्भुत संगम को निकट से अनुभव करने का अवसर मिला। इसके पश्चात हम ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु प्रस्थान किए। नर्मदा तट पर स्थित इस पावन धाम में लाखों श्रद्धालुओं के साथ दर्शन करना मेरे जीवन का एक विलक्षण अनुभव रहा। नर्मदा की कल-कल करती धारा, पर्वतों की गोद में बसा मंदिर और चारों ओर व्याप्त आध्यात्मिक ऊर्जा मन को भीतर तक स्पंदित कर रही थी। वहाँ पहुँचकर ऐसा लगा मानो सांसारिक चिंताएँ नर्मदा की धारा में बह गई हों और मन पूर्णतः शिवमय हो उठा हो।

इसके बाद हमारी यात्रा महाकाल की नगरी उज्जैन की ओर बढ़ी। प्रातःकाल छह बजे से हम दर्शन की पंक्ति में खड़े हो गए। लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के बीच महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जैसे ही बाबा महाकाल के गर्भगृह के समीप पहुँची, हृदय श्रद्धा और भक्ति से भर उठा। उस क्षण शब्द मौन हो गए और केवल भाव शेष रह गए। महाकाल के दरबार में मिली आध्यात्मिक ऊर्जा और आत्मिक शांति को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।

किन्तु इस यात्रा का एक और विशेष उद्देश्य था. साहित्य साधना का सम्मान। 31 मई, 2026 को विश्व हिंदी प्रचारिणी महासभा, इंदौर (मध्य प्रदेश) तथा यूनिक यूनिवर्सल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, इंदौर द्वारा श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के मानस भवन सभागार में आयोजित सम्मान समारोह, व्याख्यान एवं कवि सम्मेलन में मुझे अपनी काव्य प्रस्तुति देने का अवसर प्राप्त हुआ।

यह मेरे लिए अत्यंत गौरव और हर्ष का क्षण था जब साहित्य के क्षेत्र में मेरे उल्लेखनीय योगदान, समर्पण और सृजनशीलता के लिए मुझे “स्वामी श्यामानंद सरस्वती ‘रोशन’ स्मृति सम्मान” तथा “कवि सम्मेलन सम्मान–2026” से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप शॉल, मोतियों की माला, प्रतीक-चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र प्राप्त करना मेरे साहित्यिक जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि और प्रेरणादायी पड़ाव सिद्ध हुआ।

उस क्षण मुझे अनुभव हुआ कि साहित्य साधना का प्रत्येक प्रयास, प्रत्येक संघर्ष और प्रत्येक रचना सार्थक हो उठी है। मंच पर सम्मान ग्रहण करते समय मन कृतज्ञता से भर गया

उन सभी गुरुओं, परिजनों, मित्रों और पाठकों के प्रति, जिनके स्नेह और सहयोग ने मेरी लेखनी को निरंतर ऊर्जा प्रदान की।

यह यात्रा मेरे लिए केवल एक सम्मान समारोह में सहभागिता भर नहीं थी। यह यात्रा आध्यात्मिक अनुभूतियों, सांस्कृतिक वैभव, साहित्यिक उपलब्धियों और आत्मिक संतोष का सुंदर संगम बन गई। एक ओर ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से मन शिवमय हुआ, तो दूसरी ओर साहित्यिक सम्मान ने आत्मविश्वास और सृजन के नए द्वार खोल दिए।

मालवा की पावन धरती, इंदौर की सांस्कृतिक समृद्धि, उज्जैन की आध्यात्मिक गरिमा और साहित्यिक सम्मान की मधुर स्मृतियाँ मेरे हृदय में सदैव संजोई रहेंगी। यह यात्रा मेरे जीवन की उन दुर्लभ यात्राओं में से एक है, जहाँ उपलब्धि और आध्यात्मिकता ने मिलकर जीवन को एक नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान की।

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