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भगवान गणेश की पीड़ा

भगवान गणेश की पीड़ा

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

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