इंतज़ार करता आँगन

प्रफुल्ल शुक्ला सरकार, उज्जैन

चार-चार बेटे थे उनके, कोई नहीं अपनाने को,
छोड़ गए सब उन्हें अकेला, भूल गए सब आने को।

दादा-दादी साथ नहीं अब, पोतों को समझाने को,
कौन करेगा घर की चिंता, इज़्ज़त-नाम बचाने को।

मात-पिता तैयार हो रहे, विरह-आग सुलगाने को,
बेटा अब तो बड़ा हो गया, करी पढ़ाई जाने को।

दूर देश में वह बैठा है, अपना खर्च चलाने को,
बड़ी पढ़ाई करके भागा, बेटा बहुत कमाने को।

रात-दिवस माता रोती है, अपना लल्ला पाने को,
प्रफुल्ल, उसे कैसे समझाए, यहाँ नहीं कुछ पाने को।

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