छप्पन भोग और खाटू श्याम दरबार ने बांधा श्रद्धालुओं का मन

श्रीमद् भागवत कथा के पंचम दिवस का आयोजन आज अत्यंत भक्तिमय, उल्लासपूर्ण और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कथा स्थल श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति से गुंजायमान रहा। हर ओर “श्रीकृष्ण” नाम का संकीर्तन, भक्ति गीतों की मधुर ध्वनि और श्रद्धा की तरंगें वातावरण को पावन बना रही थीं।

Read More

कैसे करूं बयाँ…

केदारनाथ की कठोर ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच एक मासूम बालक का निश्छल प्रेम यह सिखा गया कि सच्ची मानवता किसी सुविधा या संपन्नता की मोहताज नहीं होती. वही निस्वार्थ सेवा जीवन भर स्मृति बनकर हृदय में बस जाती है.

Read More

करवा चौथ

साँझ के धुँधलके में जब दीपों की कतारें आँगन को सजाती हैं, हवा में करवा चौथ का सुगंधित उत्सव घुल जाता है। थाली में सिन्दूर, करवा में भरा प्यार — सब कुछ उस एक भाव के इर्द-गिर्द घूमता है जो समय की हर परीक्षा में अडिग रहा है। चाँद निकलने से पहले ही मन अपने चाँद को निहार लेता है — वही तो उसका सहारा है, वही उसका संसार। भूख-प्यास का एहसास प्रेम की ऊष्मा में कहीं विलीन हो जाता है। करवा की लौ झिलमिलाती है, जैसे रिश्तों की डोर — अटूट, पवित्र और उजली। प्रतीक्षा में बँधी आँखों में बस एक ही नाम गूंजता है, एक ही आकांक्षा साँसों में बसती है

Read More

जय मां गंगा

“गंगा उदास है… मेरी गंगा उदास है।”
भगीरथ की तपस्या से धरती पर उतरी माँ गंगा आज मनुष्य के कर्मों से मलीन हो उठी है। कभी संतों के चरणों में बहकर जग का संताप हरने वाली मंदाकिनी, आज प्रदूषण और उपेक्षा से व्यथित है। अपनी ही संतान के हाथों अपवित्र होती इस पावन धारा का मौन करुण क्रंदन — हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण बन गया है।यह कविता केवल गंगा की वेदना नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विलाप है, जिसने अपनी ही संस्कृति के प्रतीक को आघात पहुँचाया है।

Read More

दुर्गा.. 

दया और माया दो बहनें थीं। दया माँ दुर्गा की परमभक्त थी और अपने घर का पूरा काम संभालती थी, जबकि माया और उसका पति माधो आरामतलब और चालाक थे। दया और उधो की शादी हुई और उनके घर में छः बेटियाँ थीं।
नवरात्र के दिन, दया और उधो की साधारण साधना और भक्ति के बीच, उधो ने रास्ते में एक नवजात बच्ची को पाया, जिसे दया ने अपने घर ले जाकर गोद में लिया। दया ने उसे ‘दुर्गा’ नाम दिया और बिना सामग्री के ही पूजा-अर्चना की।
कुछ दिनों में घर की हालत सुधर गई और महानवमी की रात, बच्ची अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुई। देवी दुर्गा ने माधो को उसकी क्रूरता का पाठ पढ़ाया और दया के घर को आशीर्वाद देकर पुनः खुशहाली दी।कहानी यह संदेश देती है कि **सच्ची भक्ति, मानवता और दया ही परम बल हैं**, और कन्याओं का सम्मान करना जरूरी है।

Read More

गढ़ देवी माई: आस्था और कृपा का अनुभव

मेरे मायके के निकट मढ़ौरा (सारण) में गढ़ देवी माई का प्राचीन मंदिर है, जो अपनी कृपा और सबकी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए प्रसिद्ध है। वर्षों से उनके दर्शन की लालसा लिए मैं अवसर की तलाश में थी। आखिरकार, माता रानी ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं अपने मंझले भैया के साथ गांव पहुंची।

वर्षों बाद अपने बाल्यकाल की धरती पर लौटना, पुराने संगी-साथियों और घर की यादों से मिलना अत्यंत सुखद था। दिसम्बर की ठंडी सुबह, घने कोहरे के बीच हम गढ़ देवी माई के दर्शन के लिए मंदिर पहुँचे। मां का अद्भुत सौंदर्य देखते ही मैं अभिभूत होकर भावुक हो उठी। माता ने अपने स्नेह और आशीर्वाद से हमें भर दिया—सपरिवार सुख और समृद्धि का आशीष।

Read More
महिदपुर रोड के एक मंदिर परिसर में संतोष विश्वकर्मा श्रद्धालुओं के साथ खड़े, पारंपरिक परिधान में, सेवा और समर्पण का प्रतीक दृश्य

सेवा ही सबसे बड़ी साधना

महिदपुर रोड के समाजसेवी संतोष विश्वकर्मा (भूरा सेठ), जिन्हें लोग “टेम्पल मैन” के नाम से जानते हैं, अपनी गहरी धार्मिक आस्था और निस्वार्थ सेवाभाव के लिए पहचाने जाते हैं। मंदिरों के जीर्णोद्धार, नवदुर्गा महोत्सव के आयोजन और कांवड़ यात्राओं में उनका समर्पण समाज के लिए एक प्रेरणा है। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें सेवा और विनम्रता का भाव हो।

Read More

देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

Read More
भगवान गणेश की पीड़ा

भगवान गणेश की पीड़ा

ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।

मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**

Read More
devotees walking in padyatra with drums and chants heading to Sanwariya Seth temple with flowers and devotion

सेठ नहीं साक्षात श्याम हैं सांवरिया

जय सांवरिया सेठ के जयकारों के बीच मंगलवार को संतोष विश्वकर्मा के नेतृत्व में 60 श्रद्धालुओं का जत्था श्री सांवरिया सेठ मंदिर, मंडपिया (राजस्थान) के लिए रवाना हुआ। नगरवासियों ने पुष्पवर्षा कर विदाई दी, और भक्तों ने कहा— यह यात्रा नहीं, आत्मा की पुकार है।

Read More