गढ़ देवी माई: आस्था और कृपा का अनुभव

डाॅ. उर्मिला सिन्हा, रांची (झारखंड)

बात पुरानी है। मेरे मायके के निकट मढ़ौरा (सारण) में गढ़ देवी माई का प्राचीन मंदिर है, जो बहुत प्रसिद्ध है और सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली कृपालु मां भवानी हैं।

बहुत दिनों से हृदय में उनके दर्शन की लालसा लिए मैं अवसर की तलाश में थी। चूंकि बड़े भइया-भाभी सपरिवार पटना ही रहते थे, अतः मैं उनसे मिलकर शादी-विवाह में शामिल होकर वापस आ जाती थी। मन में बेचैनी सी रहती थी… कैसे उड़कर गढ़ देवी माई के दर्शन कर आऊँ।

कहते हैं, जब तक माता का बुलावा नहीं आता, हम उनके दरबार में हाजिरी नहीं लगा पाते।

खैर, मातारानी ने मेरी सुन ली। सबसे छोटे भैया की मंझली बेटी की शादी पटना में तय हुई। मैंने अपने मंझले भैया से बात की, “मैं गांव आना चाहती हूँ… गढ़ देवी माई के दर्शन करने की हार्दिक इच्छा है।”

भइया बहुत खुश हो गए। माई-बाबूजी के गुजरने के पश्चात मेरे मंझले भैया ने पुश्तैनी घर को बिल्कुल मेंटेन रखा है। उनकी दुलारी बहन अपनी जन्म-धरती पर आवै… इससे प्रसन्नता की बात भला क्या होगी।

खैर, माता रानी की कृपा से मैं अपनी निजी गाड़ी से पटना गई थी। पटना से भइया की गाड़ी, भतीजा-भतीजी तथा अपने आर्य पुत्र के साथ मैं गांव पहुंची।

वर्षों बाद वहां जाना… जहाँ मेरा बचपन बीता, मैट्रिक तक की पढ़ाई की… संगी-साथी, ग्रामीणों से मिलना… अपने बाल्यकाल के पलंग पर सोना… माता रानी की कृपा से ही संभव हो पाया था।

दिसंबर का महीना… भीषण ठंड… मैदानी इलाका, घना कोहरा… दूसरे सुबह हम खुशी-खुशी नहा-धोकर पूजन सामग्री लिए मढ़ौरा गढ़ देवी माई के दर्शन और पूजन करने पहुंचे। बहुत भीड़ थी, फिर भी हमें रास्ता मिल गया। मां का अद्भुत सौंदर्य… आंखें मिलते ही मैं रो पड़ी, “मां, इतनी प्रतीक्षा क्यों करवाई?”

जैसे माता रानी ने कहा, “समय आने पर ही काम होता है। अब दर्शन हो गया न… जाओ, फलों-फूलों… सपरिवार सदा सुखी रहो। मैं तुमसे दूर कहाँ थी… तुम्हारे साथ ही तो थी, तुम्हारे प्रत्येक कार्य में।”

मैं अभिभूत होकर कृपाधारिणी मां की अनंत आशीष को अपने खोइंछे में बांधे, वापसी के लिए रुंधे गले और नम आंखों के साथ गाड़ी में बैठी।

अब तक मैं और मेरे आर्य पुत्र अवकाश प्राप्त कर चुके थे… चारों बच्चों की शादी-विवाह और बाल-बच्चे भी हो गए थे… मैं कई चक्कर विदेश का भी लगा चुकी थी। सब पारिवारिक मांगलिक कार्य में गढ़ देवी माई की विशेष कृपा ही थी… वरना इतनी सहजता और भव्यता से सफल होना हमारे जैसे साधारण आदमी के वश का नहीं था।

भइया ने मढ़ौरा में हमारे लिए नइहर की सौगात—खूबसूरत साड़ी और शाल—खरीदी, जो आज भी हमारे पास सुरक्षित है और हमारे ऊर्जा का स्रोत भी है।

सच में, माता रानी अंतर्यामी हैं और भक्तों की इच्छाओं का मान रखती हैं।

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