(भाग–2) रहस्यमयी कहानी, नींद में चलने का खौफनाक सच

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
टी.एन.बी. कॉलेज की शेफाली बी.ए. द्वितीय वर्ष की एक मेधावी छात्रा थी। उसके टैलेंट और खूबसूरती से उसकी सहेलियाँ अक्सर ईर्ष्या करती थीं।
लड़के उसके आगे-पीछे मंडराते रहते, पर वह किसी को भी भाव नहीं देती थी। इसी कारण उसे “घमंडी” तक कहा जाने लगा, लेकिन शेफाली को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
रीता उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी।
स्पोर्ट्स, सिंगिंग, डांस और पेंटिंग—हर क्षेत्र में शेफाली अव्वल रहती थी। गृहकार्य में भी वह दक्ष थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी आदत थी नींद में चलने की।
कॉलेज की ओर से तीन दिन का टूर, यानी पिकनिक, आयोजित किया गया।
शेफाली की माँ उसकी इस आदत के कारण उसे अकेले कहीं जाने नहीं देती थीं, लेकिन काफी मनुहार के बाद पिता के कहने पर अनुमति मिल गई।
रीता को सख्त हिदायत दी गई कि वह शेफाली का पूरा ध्यान रखे।
दो शिक्षक एक पुरुष और एक महिला करीब बीस छात्र-छात्राओं को लेकर बस से मैथन डैम के लिए रवाना हुए। रास्ते भर नाच-गाना, खाना-पीना और अंताक्षरी का आनंद लेते हुए सभी गंतव्य तक पहुँच गए।
रात को अचानक रीता की नींद खुली तो उसने देखा शेफाली बिस्तर पर नहीं थी।
घबराकर वह कमरे से बाहर निकली। वह टीचर को जगाने ही वाली थी कि तभी उसने देखा एक लड़का शेफाली को सहारा देकर ला रहा था।
रीता तुरंत आगे बढ़ी और शेफाली को संभालते हुए बोली,
“आप कौन हैं? और इसे क्या हुआ?”
लड़का कुछ कहने ही वाला था कि रीता ने बात काट दी—
“ठीक है, आप जाइए… अगर किसी ने देख लिया तो परेशानी हो जाएगी।”
शेफाली मूर्छित-सी थी। अधखुली आँखों से वह सब देख-सुन तो रही थी, पर समझ कुछ नहीं पा रही थी।
सुबह जब रीता ने उससे पूछा, तो कोई स्पष्ट जवाब न मिलने पर वह नाराज़ हो गई।
“मैं सच कह रही हूँ, मुझे कुछ नहीं पता कि मैं वहाँ कैसे पहुँची… मुझ पर भरोसा कर,” शेफाली ने समझाने की कोशिश की।
दूसरे दिन भी रीता का मन उखड़ा-उखड़ा रहा। उसके दिमाग में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—शेफाली वहाँ क्या कर रही थी… और वो लड़का कौन था?
दिनभर सबने खूब मस्ती की, घूमे-फिरे और थोड़ा-बहुत पढ़ाई भी की, क्योंकि यह टूर प्रोजेक्ट का हिस्सा था।
लेकिन रात होते ही वही घटना दोहराई गई।
इस बार रीता को गुस्सा आ गया। उसने शेफाली को खूब डाँटा, पर कोई फायदा नहीं हुआ।
तीसरे दिन…
सुबह सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन दोनों सहेलियों के बीच दूरी साफ नजर आ रही थी।
शेफाली एक पेड़ के नीचे कॉपी-कलम लेकर बैठी थी और नोट्स लिख रही थी।
तभी वही लड़का उसके पास आया-
“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
शेफाली ने हल्की-सी झिझक के बाद इशारे से बैठने की अनुमति दे दी।
“आप भी प्रोजेक्ट तैयार कर रही हैं?”
“जी…” उसने अनमने ढंग से जवाब दिया।
“हमारा कॉलेज भी इसी उद्देश्य से आया है।”
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद उसने पूछा-
“आपको नींद में चलने की बीमारी है…?”
यह सुनकर शेफाली चौंक गई। उसकी भृकुटियाँ तन गईं और वह ध्यान से उसे देखने लगी।
गौर रंग, गहरी हल्की नीली आँखें, सलीकेदार बाल और हल्की मूंछें… उसकी आवाज़ भी प्रभावशाली थी।
“क्या हुआ? जवाब नहीं देंगी?”
लड़का मुस्कुराया और उसके गालों में पड़े डिंपल और भी आकर्षक लगने लगे।
“अ… हाँ, शायद… माँ कहती हैं, मुझे खुद नहीं पता चलता,” शेफाली ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।
उसी समय रीता वहाँ पहुँची और दोनों को साथ बैठे देख गुस्से से वापस लौट गई।
शाम को शेफाली ने सब कुछ सच-सच बताया, लेकिन रीता को विश्वास नहीं हुआ।
उसे लगा, शेफाली उससे कुछ छिपा रही है।
“चल, सो जा… सुबह निकलना भी है,” कहते हुए रीता ने दरवाजे की ऊपर-नीचे दोनों कुंडियाँ बंद कर दीं।
“आज दरवाजा क्यों बंद कर रही है? अगर रात में किसी को जरूरत पड़ी तो…?”
“हाँ, मुझे पता है किसे जरूरत पड़ती है… देखती हूँ आज। खबरदार, जो दरवाजा खोला!”
आधी रात…
रीता ने करवट बदली
और जैसे ही उसकी नजर शेफाली के बिस्तर पर पड़ी…
वह सन्न रह गई।
बिस्तर फिर से खाली था…!
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लेखिका के बारे में-
रीता मिश्रा तिवारी
हिंदी साहित्य जगत की एक सशक्त और संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनका जन्म 12 दिसंबर 1967 को बिहार के भागलपुर में हुआ। शिक्षिका के रूप में दीर्घकालीन सेवा के पश्चात आज वे सेवा निवृत्त होकर पूर्णतः साहित्य सृजन में समर्पित हैं। एम.ए. एवं बी.एड. शिक्षित रीता जी ने ज्ञान और संस्कारों का दीप जलाते हुए समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। कविता, कहानी, लघुकथा, हाइकु, संस्मरण और आलेख जैसी विविध विधाओं में उनकी लेखनी समान रूप से सशक्त और प्रभावशाली है। उनकी रचनाओं में जीवन की संवेदनाएँ, समाज की सच्चाइयाँ और मानवीय भावनाओं की गहराई स्पष्ट झलकती है। आकाशवाणी भागलपुर से उनके काव्य एवं कथा पाठ का नियमित प्रसारण उनकी साहित्यिक सक्रियता का प्रमाण है। उनकी प्रमुख कृतियों में “अविता” (एकल कहानी संग्रह) और “प्रेम लौटता है” (एकल काव्य संग्रह) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त वे अनेक प्रतिष्ठित साझा काव्य एवं कहानी संकलनों का हिस्सा रही हैं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं और ई-पत्रिकाओं में उनकी 300 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित होकर पाठकों के बीच सराही जा चुकी हैं। रीता मिश्रा तिवारी के लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का सजीव दर्पण है, जिसमें जीवन के अनछुए पल, अनुभव और यथार्थ सजीव हो उठते हैं। उनकी लेखनी न केवल विचारों को झकझोरती है, बल्कि पाठकों के हृदय को भी गहराई से स्पर्श करती है।
