मिट्टी की खुशबू रोती रही
यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।

यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।
बचपन की यादें हमेशा खास रहती हैं। रविवार की सुबह, बारिश में कागज़ की कश्ती तैराना, दोस्तों के घर जाकर टीवी देखने की खुशी ये छोटे-छोटे पल हमारी दुनिया को पूरी तरह जीवंत बना देते थे। अब काम, ऑफिस और जिम्मेदारियों के बीच वही मासूमियत खो गई है, पर अंदर वही छोटा बच्चा अभी भी जिंदा है, बारिश में कागज़ की कश्ती बहा रहा है, और हर याद उसे मुस्कुराकर बुला रही है।
एक लंबे समय बाद उसी स्टेशन पर उतरते ही यादों की महक मुझे बाँहों में भर लेती है। बचपन की गलियाँ, नीम का पेड़, उड़ती रुई और टूटी-फूटी बस सब मन के भीतर फिर से जीवित हो उठते हैं। मगर जब शहर नए नामों और मॉलों में बदल चुका होता है, तो एहसास होता है कि स्मृतियाँ जहाँ ठहरी थीं, समय वहाँ से बहुत आगे निकल गया है।
कभी अल्हड़ और शरारती रहे हम, अब समझदार होकर चुप्पी में जीना सीख गए हैं। मौसम, बारिश और दोस्तों संग बिताए हंगामे पीछे छूट गए। अब खुशियाँ भी मन में ही दबाकर रख लेते हैं। ज़िंदगी की राह पर निकले तो थे कहीं और, पर दिशा बदल गई और हम धीरे-धीरे बदलते गए।
आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।
गांव से बड़े स्कूल में आना नया अनुभव था जेब में रोज़ के सिर्फ़ दस पैसे, और आधे इंटरवल में कमलसिंह बापू के ठेले से पाँच पैसे के दो केले ही हमारा भोजन। वही ठेला छात्रों की राजनीति का अड्डा था, जहाँ बापू कभी रावण, कभी विदूषक तो कभी किंगमेकर बनकर चमकते। उधार की सीमा पच्चीस पैसे तक थी, पर मुस्कुराकर केले थमा देने वाला उनका अपनापन आज भी स्मृति में ताज़ा है. छोटे दिनों की बड़ी गर्माहट जैसा।
कभी शादियाँ सिर्फ दो लोगों का नहीं, पूरे मोहल्ले का उत्सव हुआ करती थीं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, बुआ-मौसी की हंसी, आँगन में उबलती खीर . सब जैसे आज भी स्मृतियों में ताजे हैं। पर अब शादी की रस्में कैमरे की फ्रेमिंग में बंध गई हैं, और भावनाएँ फिल्टरों के नीचे धुंधली।
बीस साल बाद एक ट्रेन के कंपार्टमेंट में हुई ये आकस्मिक मुलाकात जहाँ न शब्द थे, न शिकायते सिर्फ वही पुरानी खुशबू, वही मोहब्बत और दो लोगों के बीच पसरी खामोशी, जो बोलती तो थी… मगर सिर्फ दिलों में
महिदपुर रोड का पुराना स्टेशन आज भले बदल गया हो, लेकिन इसकी ब्रिटिश-era इमारत, स्टीम इंजन की छुक–छुक, और स्टेशन मास्टर काका देवेनदास भाटिया जैसी शख्सियतें अब भी कस्बे की यादों में वैसे ही जिंदा हैं जैसे कभी प्लेटफॉर्म पर तैरता बीड़ी का धुआँ और बड़ी होटल की चाय की खुशबू।