
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
विगत सप्ताह मेरी नजर सुनील परिहारजी के लेख ढोल थम गया पर पड़ी. शब्दों ने मन के किसी कोने में दबे पड़े स्मृतियों के सिन्दूर को फिर से गीला कर दिया. सोचा शादियाँ तो आज भी होती हैं, बारातें निकलती हैं, मंडप सजते हैं, पर न जाने क्यों उस पूरे माहौल की आत्मा कहीं पीछे छूट गई लगती है.
कभी शादियाँ इवेंट नहीं होती थीं, त्यौहार होती थींवो भी ऐसा कि एक घर में लगने वाला माण्डा पूरे मोहल्ले, गलियों, चौपालों तक महक जाता. इवेंट मैनेजमेंट के नाम पर कोई कंपनी नहीं, घर की बुआ, चाचियाँ, मौसियाँ ही पूरी टीम होती थीं. कोई दौड़कर दहेज की थाली सजाता, कोई मेहमानों की लिस्ट बनाता, तो कोई रात भर बैठकर हल्दी का उबटन पीसता.
शादी की तारीख घोषित होते ही बुआ-बेटियाँ पोटली-कपड़े समेत घर आ धमकतीं और फिर घर का हर कोना हँसी, ठिठोली और गीतों की गूंज से जीवंत हो उठता. लड़कियों के कमरे में सुई-धागे की खनक, आँगन में ढोलक की थाप और रसोई में पकते लड्डुओं की खुशबूशादी केवल दो लोगों का मिलन नहीं, पूरा सामाजिक उत्सव हुआ करती थी.
ढोलक की थाप पर जब बन्ने-बन्नी गाया जाता, तो पड़ोसियों को बिना बताये ही खबर हो जाती कि इस घर में खुशियाँ उतरी हैं. न कोई कोरियोग्राफर होता, न तय स्टेप्स नाच मन के सुरों पर होता था, पैरों के नहीं. गीत रिश्तों को पिरोते थेकहीं छेड़छाड़, कहीं शिकायत, कहीं मीठा अपनापन. वह संगीत कैमरे नहीं, दिल में कैद हो जाता था.

पर आज?
सब कुछ नियोजित पैकेज्ड. सहजता की जगह थीम और प्रॉप्स, भावना की जगह पोज़ और रील्स ने ले ली है. हल्दी-मेहंदी का रंग चिप्स की थाली जैसा इंस्टाग्राम-फ्रेंडली होना चाहिए, वरना रस्म अधूरी मानी जाती है. अब रस्मों में त्वचा निखरने से ज्यादा फोटो पर निखार की चिन्ता होती है. हम बार-बार कुछ नया करने की होड़ में, शायद जाने-अनजाने अपनी पुरानी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं.
सचमुच, ढोल थमा नहीं है, वो शोर में दब गया है.
शादियाँ अब भी भव्य हैं, चमकदार हैं, पर पहले जैसा स्नेह, अपनापन और पारिवारिक स्पर्श जैसे कहीं पन्नों के बीच रखा एक सूखा गुलाब बन गया है, दिखता तो है, पर खुशबू अब वैसी नहीं है.
