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रील्स की चमक में खो गई वो पुरानी शादी

कभी शादियाँ सिर्फ दो लोगों का नहीं, पूरे मोहल्ले का उत्सव हुआ करती थीं। ढोलक की थाप पर गाए जाने वाले बन्ने-बन्नी के गीत, बुआ-मौसी की हंसी, आँगन में उबलती खीर . सब जैसे आज भी स्मृतियों में ताजे हैं। पर अब शादी की रस्में कैमरे की फ्रेमिंग में बंध गई हैं, और भावनाएँ फिल्टरों के नीचे धुंधली।

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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