राशि एक आत्मनिर्भर लड़की थी. ३१ साल की उम्र तक उसने ज़िंदगी के हर मोर्चे पर खुद को साबित कर दिखाया था. पढ़ाई पूरी की, नौकरी पाई, और वो सब हासिल किया जो उसने कभी सपने में देखा था. पर ज़िंदगी की असली परख तब शुरू हुई जब आखिरी साल की पढ़ाई के दौरान ही उसके एक रिश्तेदार-कम-मित्र ने उसे प्रपोज़ किया. २३ की उम्र में, जब शादी का मतलब बस साथ रहना लगता है, उसने हां कह दिया. उसे क्या पता था कि साथ रहना इतना आसान नहीं होता.राशि इंदौर की थी, और सपना लेकर मुंबई पहुंची थी जहां उसके पति मयंक का जॉब था, मयंक मथुरा का था.
शुरुआत में ही दोनों के बीच टकराव शुरू हो गया. मयंक ज़रा ज़्यादा ही परफेक्शनिस्ट था. उसे लगता था, जो घर पर रहता है, वही घर का हर काम करे. और राशि? वह तो अपने माता-पिता की लाडली, परी-सी बेटी, जिसने कभी भी किसी चीज़ की कमी नहीं देखी थी.
मयंक का ऐसा सोचना गलत नहीं था उसने बचपन से यही देखा था, यही सीखा था. उसने शादी से पहले राशि से कहा था कि तुम जैसे चाहे वैसे जी सकती हो, पर वह बातें व्यवहारिक नहीं थीं. राशि ने पढ़ाई पूरी होते ही एक स्कूल में शानदार नौकरी जॉइन की. धीरे-धीरे ससुराल की जिम्मेदारियां भी समझ में आने लगीं, लेकिन राशी की सोच साफ थी अगर वह अपने ससुराल वालों की देखभाल करती है, तो मयंक को भी उसके माता-पिता का ख्याल उतना ही रखना चाहिए.
मगर मायका और ससुराल एक ही शहर में होने के कारण खींचतान और लड़ाइयां बढ़ने लगीं.सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती जब मयंक सबकुछ देखकर भी चुप रह जाता. राशि चुप रहने वालों में से नहीं थी, वह सास-ससुर की हर बात का जवाब देती, अपना पक्ष रखती
फिर मयंक का ट्रांसफर हुआ वह सूरत (गुजरात) चला गया. राशी ने अपनी नौकरी छोड़ दी और उसके साथ चली गई. वहां पहुंचकर उसने फिर से काम शुरू किया. लेकिन अब सबकी नज़र उस पर टिक गई थी अब तो बेबी प्लान करो.पर मयंक बच्चे के लिए तैयार नहीं था. राशि ने दो साल लगाकर उसे समझाया, मनाया. आखिरकार, एक प्यारी सी बेटी मआर्याफ का जन्म हुआ. उस दिन पहली बार राशि और मयंक दोनों ने एक सच्ची खुशी महसूस की.मयंक आर्या को लेकर बेहद पज़ेसिव था. उसे एक मच्छर भी काट जाए, तो वह बेचैन हो उठता. राशी ने एक साल तक घर से काम किया और फिर ऑफिस जाने लगी.
प्यार अब भी था, पर मयंक के पुराने रवैये में कोई बदलाव नहीं आया था. शायद यही वजह थी कि राशि कभी नौकरी से ब्रेक नहीं लेना चाहती थी वह मयंक के साथ ज़्यादा वक्त बिताने से बचती थी. लेकिन उसने सब संभालना सीख लिया था बच्ची, नौकरी, परिवार… सब कुछ्. अब वो पहले से कहीं ज़्यादा समझदार और संतुलित हो गई थी. दो साल की आर्या उसके अंदर की परवरिश की सच्ची छवि थी.
कभी-कभी मयंक या राशि के माता-पिता उनके साथ रहने आ जाते. आर्या भी नाना-नानी और दादा-दादी के बीच बड़ी हो रही थी.और फिर एक दिन… राशि को उसकी कंपनी में प्रमोशन मिला. वह मैनेजर बन गई. उसी के साथ उसे एक स्टार्टअप अवॉर्ड शो में कंपनी का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. जब वह उस मंच पर खड़ी हुई, अपनी मेहनत, संघर्ष और आत्म-सम्मान के साथ तो सबसे ज्यादा कोई खुश था, तो वो थी खुद राशि. आज वो हर काम में परफेक्ट थी पर उसकी परफेक्शन उसकी चमकती मुस्कान में नहीं, उसकी थकान में छिपी संतुष्टि में थी. उसकी परवरिश उसकी बेटी में झलकती थी.
राशि अब भी रोज़ संघर्ष करती है पर अब वह अपने लिए, अपनी बेटी के लिए, और उस खुद्दारी के लिए लड़ती है जिसने उसे राशि बनाया है.
रक्षा उपाध्याय, सुुप्रसिद्ध कहानीकार, इंदौर

आपने इस प्लेटफार्म पर जो स्नेह दिखाया है उसके लिए दिल से आभार, लेखकों की रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी अवश्य प्रदान कीजिए और वेेबसाइट के बारे में भी अपनी अमूल्य राय दें ताकि भविष्य में इसमें अच्छे परिवर्तन किए जा सकें. आपके सुझाव हमारे लिए बेशकीमती है. अपनी राय अवश्य प्रकट करें.
– सुरेश परिहार
Rashi jesi kai ladkiya hai par rashi ne apni khushiyan dhundh li