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कैब चलाती आत्मनिर्भर महिला ड्राइवर देवर्षि, रात की यात्रा के दौरान प्रेरणा देती हुई।

शुक्रिया देवर्षि

दिल्ली से अहमदाबाद की एक साधारण-सी कैब यात्रा, जीवन का असाधारण अनुभव बन गई। महिला कैब ड्राइवर देवर्षि की आत्मनिर्भरता, साहस और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण ने यह एहसास कराया कि स्त्री हर चुनौती का सामना करने में सक्षम है। संवेदनाओं से भरा यह संस्मरण पाठकों को लंबे समय तक याद रहेगा।

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जो टूटी नहीं.. वो राशि थी

राशि अब भी रोज़ लड़ती है—कभी खुद से, कभी हालातों से, और कभी रिश्तों की खामोश दीवारों से। पर अब उसकी लड़ाई किसी को मनाने की नहीं, खुद को साबित करने की भी नहीं… अब उसकी लड़ाई खुद को खोने से बचाने की है।

उस दिन जब वो मंच पर खड़ी थी, साड़ी के पल्लू में कॉर्पोरेट पहचान और आंखों में एक मां की नमी समेटे—तब शायद पहली बार उसने खुद को पूरा महसूस किया।

जिसने कभी सपने पूरे करने के लिए किसी का सहारा नहीं माँगा, आज वो अपने संघर्ष की इमारत में अपनी बेटी के लिए खिड़कियाँ बना रही थी—जहाँ से आर्या रोशनी देख सके, आज़ादी की हवा महसूस कर सके। राशि जान चुकी थी—”परफेक्ट” दिखना ज़रूरी नहीं, खुद को समझना, स्वीकारना और थामे रखना उससे कहीं ज़्यादा बड़ा काम होता है।

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