जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

कंक्रीट को तोड़कर उगता पीपल का पेड़ और आत्मविश्वास से खड़ी एक मजबूत महिला

डॉ. मीना ‘मुक्ति’, लातूर

यकीन मानो
जिनको तोड़ा जाता है ..
वे बहुत खतरनाक अंदाज में
फिर से उभर कर आते हैं ।

पीपल के समान
पूरी शिद्दत के साथ ..
जहां संभावनाएं न हो वहां भी
हरे भरे बने रहते हैं ।

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स्त्री के समान
जहां कुचला जाता है ..
अत्यंत सहनशीलता के साथ
वहीं पर उगना चाहते हैं ।

51 thoughts on “जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

      1. बहुत अद्भुत और प्रभावशाली रचना। बहुत बढ़िया डॉ. मीना जी! 🙏

        1. धन्यवाद वर्षा जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

      2. अकाट्य सत्य , स्त्री शक्ति के अद्भुद एवं स्वाभाविक साहस को सरल और सहज रूप से प्रस्तुत करने के लिए आपको अशेष बधाई मीना जी।

      3. अकाट्य सत्य , स्त्री शक्ति के अद्भुद एवं स्वाभाविक साहस को सरल और सहज रूप से प्रस्तुत करने के लिए आपको अशेष बधाई मीना जी।

    1. हार्दिक धन्यवाद मेधा जी 🙏🏼

    2. वाह ! स्त्री की असीमित शक्ति को दर्शाती एक सुंदर,सरल और सच्ची कविता।हार्दिक बधाई मुक्ति जी,शुभ कामनाएं…

      1. हार्दिक धन्यवाद कबीर जी 🙏🏼🙏🏼
        आपकी सराहना और समीक्षा मेरा हौसला बढाने में हमेशा सहायक रहेगा ..🙏🏼🙏🏼🙏🏼

    3. “शब्द थेट अंतर्मनाला भिडले. जिद्द आणि संवेदनशीलतेचं सुंदर प्रतिबिंब.”

      1. खूप धन्यवाद दिशा 🙏🏼🙏🏼🙏🏼
        तु व्यक्त केलेल हे मत तुझ्या विचारांची खोली दर्शवत 🙏🏼🙏🏼 खूप अभिमान वाटतो तुझा खूप प्रगती कर 👏🏼👏🏼👏🏼

    4. नक्कीच! खाली दिलेली लघु टिप्पणी “कविता” हा शब्द न वापरता सादर केली आहे:

      “शब्दांची अशी मांडणी जी थेट मनाला स्पर्श करते. प्रत्येक ओळीतून जिद्द, सहनशीलता आणि नव्याने उभं राहण्याचं बळ अनुभवायला मिळालं. मनापासून आभार आणि शुभेच्छा मीना मॅडम 💐💐

    5. आपकी रचना बहोत वास्तववादी है। पीपल का वृक्ष तोडे जाने पर नई उमंग और उत्तेजना के साथ उभरकर आता है। उसी प्रकार एक स्त्री को तोडा जाए , उसको ठेस पहुँची जाए तो वह उतनी दुगनी शक्ती के साथ उभरकर आती है।
      उसकी आंतरिक शक्तियाँ जाग जाती है और वह नई उमंगो के साथ उभरकर आती है। बहोत बढ़ीया रचना है आपकी मीना जी।

      1. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय 🙏🏼🙏🏼🙏🏼
        आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए महत्वपूर्ण है 👏🏼👏🏼👏🏼

      2. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय 🙏🏼🙏🏼🙏🏼
        आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए महत्वपूर्ण है ।

  1. जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री अच्छी और सच्ची कविता।अभिनंदन आपका।

    1. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय 🙏🏼

  2. जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री अच्छी और सच्ची कविता।अभिनंदन आपका।

    1. हृदय से धन्यवाद सर जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  3. बहोत खूब मीना जी
    वास्तव चित्र दिखाया आपने स्त्री जीवन का
    आपके इस स्त्री पैलू के अध्ययन और अनुभव कथन को ढेर सारी शुभेच्छा…

  4. स्त्री जीवन का संघर्ष ,शक्ती दर्शाती है ये कविता

    1. धन्यवाद ! देवीदास पाचंगे जी आपकी प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है …

  5. निसर्ग विषयक भाव – भावना, प्रतिकूल अवस्थेतून संघर्ष करीत आपले अस्तिव सिद्ध करणारा मौलीक संदेश…
    हार्दिक अभिनंदन व शुभेच्छा मॅडम
    🌹🌹🌹👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👌🏻👌🏻🙏🏻

    1. धन्यवाद टेकले सर 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  6. “शब्दांची अशी मांडणी जी थेट मनाला स्पर्श करते. प्रत्येक ओळीतून जिद्द, सहनशीलता आणि नव्याने उभं राहण्याचं बळ अनुभवायला मिळालं. मनापासून आभार आणि शुभेच्छा मीना मॅडम 💐💐

    1. जीवन अनुभव की पाठशाला है । हमें यहां सबकुछ सीखना को मिलता है । बस सीखते सीखते कहीं थकना नहीं है …

    1. धन्यवाद अपर्णा जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  7. बहुतही बढिया 🙏🏻🙏🏻
    एक यथार्थ प्रस्तुत किया हैं मॅडमजी आपने…
    “स्त्री को जब कुचला जाता है” एक गहरी पीड़ा, सवाल और सामाजिक यथार्थ सामने आता है।
    वही यथार्थ एक भावनात्मक और विचारोत्तेजक रूप में प्रकट आपकी रचना
    हैं l
    कम शब्दों में संपूर्ण भाव… 🙏🏻🙏🏻

    जब स्त्री को कुचला जाता है,
    तो सिर्फ एक देह नहीं टूटती,
    बिखरती हैं आत्माएँ,
    दम घुटता है इंसानियत का।

    1. हार्दिक धन्यवाद उर्मिला जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼
      मानसशास्त्र की दृष्टी से और कसौटी पर आपने मेरी रचना को परखा और अपना विद्वत मत प्रदर्शित किया …
      समाज में रहना है तो
      पीडा को सहना है
      सवालों से टकराना है
      विचारों को पोषित करना है
      भावनाओं को संभालना है संजोना है ..
      स्त्री को हद में हद से गुजरना है …
      सोचना और समझना भी तो है …
      बिखरी आत्माओं को समेटना है
      चलते चले जाना है …

  8. आपकी रचना बहोत वास्तववादी है। पीपल का वृक्ष तोडे जाने पर नई उमंग और उत्तेजना के साथ उभरकर आता है। उसी प्रकार एक स्त्री को तोडा जाए , उसको ठेस पहुँची जाए तो वह उतनी दुगनी शक्ती के साथ उभरकर आती है।
    उसकी आंतरिक शक्तियाँ जाग जाती है और वह नई उमंगो के साथ उभरकर आती है। बहोत बढ़ीया रचना है आपकी मीना जी।

    1. समीक्षा और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद सर जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

    1. धन्यवाद जयश्री जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  9. अद्भुत और प्रभावशाली रचना। बहुत बढ़िया डॉ. मीना जी! 🙏

    1. समीक्षा और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद वर्षा जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  10. डॉ.मीना मैडम,
    आपकी रचना स्त्री शक्ति की वास्तविकता को व्यक्त कर रही है बहुत ही अच्छी और प्रेरणादायक रचना है।
    🙏🏻💐

    1. धन्यवाद नीतिश जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

  11. डॉ.मीना मैडम,
    आपकी रचना स्त्री शक्ति की वास्तविकता को व्यक्त कर रही है बहुत ही अच्छी और प्रेरणादायक रचना है।
    🙏🏻💐

  12. अभिनंदन मैडॅम 💐
    अप्रतिम… 🙏
    मैडम च्या ह्या रचनेतून स्त्री ची सहनशक्ती कळून आली.खरंच…. 🌹
    स्त्री होणं सोपं नसतं…
    अर्ध आयुष्य दुसऱ्या चा विचार करण्यात च
    जात.
    स्त्री होणं सोपं नसतं…
    अर्धी स्वप्न मनात च संपवावी लागतात.
    स्त्री होणं सोपं नसतं…
    खूप काही सांगायचं असत, बोलायचं च
    असतं, पण अर्ध आयुष्य दुसऱ्या ची
    बोलणी ऐकण्यात जात….
    खरंच स्त्री होणं सोपं नसतं 💯

    न स्त्रीरत्नसमं रत्नम|…💯🙏
    (स्त्री रत्न से समान और कोई रत्न नहीं|)

    पुनः इस रचना के लिये मैडम का अभिनंदन… 💐

    1. मयुरी वाह ! वाह !
      बेहद महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया …
      स्त्री की दशा और दिशा को तुमने बहुत जल्दी समझ लिया है बेटा … बेहद सफल और उज्जवल भविष्य है तुम्हारा … तुम्हारी सोच को धार मिलती रहे..

  13. आभार

    आपने आदरणीय मीनाजी और वेबसाइट के प्रति जो असीम प्रेम दर्शाया है उसके लिए हार्दिक आभार

    आप भी अपनी रचनाएं भेजिए.

    1. मेरी भूमिका तो तुम में उतरी है उभरी है …
      अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए बहुत सारा प्यार बच्चा 💗

  14. खूप सुंदर कविता लिहिली आहे मॅम तुम्ही. शब्द थेट मनाला स्पर्श करत आहेत खूप छान मॅम…🙏🌍

  15. आपने इस प्लेटफार्म पर जो स्नेह दिखाया है उसके लिए दिल से आभार, लेखकों की रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी अवश्य प्रदान कीजिए और वेेबसाइट के बारे में भी अपनी अमूल्य राय दें ताकि भविष्य में इसमें अच्छे परिवर्तन किए जा सकें. आपके सुझाव हमारे लिए बेशकीमती है. अपनी राय अवश्य प्रकट करें.
    – सुरेश परिहार

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