
सुनील परिहार
आज मेरे घर का एक छोटा-सा कोना खाली हो गया. दीवार के पास बना वह नन्हा-सा घोंसला, जो पिछले कई दिनों से चहचहाहट, हलचल और जीवन की मधुर ध्वनियों से भरा रहता था, आज अचानक शांत हो गया. कारण यह था कि उस घोंसले में पल रहे गौरैया के तीनों बच्चे अपने छोटे-छोटे पंखों में उड़ान का विश्वास भरकर खुले आसमान की ओर निकल चुके थे.
उनके उड़ जाने के बाद मन में एक अजीब-सी खामोशी उतर आई. खुशी भी थी कि वे अपने जीवन की पहली मंजिल तक पहुँच गए, लेकिन साथ ही एक गहरा खालीपन भी था. जैसे घर का कोई अपना सदस्य विदा होकर दूर चला गया हो.
कुछ दिन पहले तक वे तीनों बच्चे इतने छोटे थे कि घोंसले के बाहर झाँकने तक से डरते थे. फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपने पंख फड़फड़ाने शुरू किए. कमरे के भीतर उनकी पहली उड़ानें किसी मासूम बच्चे के पहले कदमों जैसी थीं. कभी वे दीवार से टकरा जाते, कभी बिस्तर पर आ गिरते, तो कभी पलंग के नीचे दुबककर बैठ जाते. उनकी घबराहट, उनकी जिज्ञासा और दुनिया को जानने की उनकी उत्सुकता को देखना किसी अद्भुत अनुभव से कम नहीं था.
सबसे भावुक दृश्य तब होता था जब उनकी माँ की आवाज सुनाई देती. घोंसले में बैठे तीनों बच्चे अचानक उत्साह से भर जाते और उनकी चहचहाहट पूरे कमरे में गूँज उठती. मानो वे कह रहे हों माँ आ गई… माँ आ गई.. और फिर अगले ही क्षण उनकी माँ या पिता चोंच में दाना लेकर पहुँच जाते. दिन भर यही क्रम चलता रहता.
सुबह के चार बजे से उनकी दिनचर्या शुरू हो जाती. जब दुनिया का अधिकांश हिस्सा नींद में डूबा रहता, तब ये छोटे-से जीव अपने परिवार के लिए संघर्ष में जुट जाते. माँ और पिता न जाने कितनी दूर-दूर तक उड़कर भोजन जुटाते और बार-बार अपने बच्चों के पास लौटते. न शिकायत, न थकान, न कोई अपेक्षा बस प्रेम, कर्तव्य और समर्पण.
मैं अक्सर उन्हें देखता और सोचता कि प्रकृति कितनी महान शिक्षक है. वह बिना किसी किताब, बिना किसी उपदेश और बिना किसी विद्यालय के जीवन के सबसे बड़े पाठ पढ़ाः देती है.
फिर वह दिन भी आ गया, जब उन बच्चों ने घोंसले की सीमाओं से बाहर निकलकर आकाश को अपना घर मान लिया. पहले एक उड़ा, फिर दूसरा और अंत में तीसरा भी. कुछ देर तक वे आसपास मंडराते रहे, जैसे अपने बचपन को आखिरी बार देख रहे हों. फिर धीरे-धीरे वे दृष्टि से ओझल हो गए.
उनके उड़ जाने के बाद मेरी निगाहें बार-बार उसी खाली घोंसले पर टिक जाती हैं. अभी कल तक जो स्थान जीवन से भरा था, आज वहाँ सन्नाटा है. लेकिन उस सन्नाटे में भी एक गहरा संदेश छिपा है.
प्रकृति सिखाती है कि प्रेम का अर्थ किसी को अपने पास बाँधकर रखना नहीं, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाना है कि वह अपने दम पर जीवन की उड़ान भर सके. गौरैया के माता-पिता ने अपने बच्चों को प्रेम दिया, सुरक्षा दी, भोजन दिया, उड़ना सिखाया और फिर सही समय आने पर उन्हें खुले आसमान के हवाले कर दिया. उन्होंने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की, क्योंकि वे जानते थे कि सच्चे प्रेम की अंतिम मंजिल स्वतंत्रता है.
शायद अब वे बच्चे कभी अपने माता-पिता को पहचान न सकें. शायद उनके माता-पिता भी उन्हें ढूँढ़ने न निकलें. प्रकृति में यही व्यवस्था है. वहाँ मोह है, लेकिन बंधन नहीं. वहाँ अपनापन है, लेकिन स्वामित्व नहीं. वहाँ प्रेम है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ.गौरैया के इस छोटे-से घोंसले ने मुझे जीवन का एक बड़ा सत्य समझाया है माता-पिता का सबसे बड़ा कर्तव्य अपने बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करना है, न कि उन्हें हमेशा अपने संरक्षण में बाँधे रखना. जब समय आए, तो उन्हें विश्वास के साथ अपनी राह चुनने देना चाहिए, क्योंकि उड़ान तभी संभव है जब पंखों को खुला आसमान मिले. आज घोंसला खाली है, लेकिन उसकी स्मृतियाँ मेरे मन में हमेशा आबाद रहेंगी. उन नन्हे पंखों की पहली उड़ान ने मुझे फिर याद दिलाया कि जीवन का सबसे सुंदर रूप परिवर्तन में है, सबसे बड़ा साहस स्वतंत्रता में है और सबसे गहरा प्रेम विदा देने की क्षमता में. जब भी उस खाली घोंसले को देखूँगा, मुझे उनकी चहचहाहट नहीं, बल्कि प्रकृति का वह अनमोल संदेश सुनाई देगा यदि प्रेम करते हो, तो उड़ना भी सिखाओ.

खाली घोंसला भरा हुआ मन….सुनील परिहार जी का उच्च कोटि का संस्मरण,इसे पढ़ते हुए कहीं मन भावुकता में भींग उठा तो कहीं मातृत्व के समर्पण पर नत मस्तक हुआ…सुंदर सारगर्भित संदेश।शानदार सृजन