किताब “स्मृति नाद” के साथ बैठा व्यक्ति, यादों और भावनाओं में खोया हुआ

आत्मा को स्पर्श करती “स्मृति नाद”

“स्मृति नाद” अपूर्वा की ऐसी काव्य कृति है, जो स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के गहरे संसार को सजीव करती है। इसमें मां, पिता और बचपन से जुड़ी अनुभूतियां इतनी सजीव हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीने लगता है।

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माएं कभी बूढ़ी नहीं होती, बस हम बदल जाते हैं

माएं कभी बूढ़ी नहीं होती

माएं कभी बूढ़ी नहीं होतीं, उनकी उम्र भले ही बढ़ जाए, लेकिन ममता हमेशा जवान रहती है. जिस मां ने अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में समर्पित कर दिया, वही मां एक समय ऐसा भी देखती है जब उसकी चिंता बच्चों को बोझ लगने लगती है. यह लेख उसी बदलते रिश्ते की सच्चाई और मां के त्याग को गहराई से महसूस कराने की एक संवेदनशील कोशिश है.

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जीवन के विभिन्न भावनात्मक रंगों को दर्शाता होली का दृश्य

रंगों से सजी ज़िंदगी

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद रंग ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते हैं।जीवन में हर रंग अपनी अहमियत दर्ज कराने समय-समय पर चला आता है। अमूमन हम नीले, पीले, हरे और सबसे पुराने रंगगुलाबी के बारे में जानते हैं। रंग ज़िंदगी में हों या शब्दों में… वे खुद को बयां कर ही देते हैं। आइए जानते हैं,…

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पर्स में रखा दिल रोमांटिक हिंदी गद्य अहसास

जब दिल बोले…यहीं ठीक हूँ

उनके पर्स के किसी कोने में मेरा दिल रखा है—मेकअप की चीज़ों से घिरा हुआ। दिल कभी शिकायत करता है, कभी जिद करता है कि उसे वहीं रहने दो। वजह बड़ी मासूम है जब भी वह पर्स खोलती हैं, उनकी उँगलियों का स्पर्श दिल को ऐसा सुकून देता है कि सारी चुभन भूल जाती है। दिल मानता है कि सबसे महफ़ूज़ और मीठी जगह वही है, जहाँ अहसास बिना बोले छू लेते हैं।

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सिगड़ी के पास सिमटी यादें

सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।

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गोवा के समुद्र तट पर परिवार के साथ बिताए भावनात्मक पल

वाह… गोवा… वाह !

गोवा की यह यात्रा शोर-शराबे से ज़्यादा स्मृतियों की शांति है। समुद्र की लहरें, माँ की यादें, पोते की ज़िद और परिवार के साथ बिताए पल—यह संस्मरण गोवा को महसूस करने की एक भावनात्मक कोशिश है।

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रिश्तों की अहमियत समझो, डस्टबिन में मत डालो

सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।

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ढोल थम गया, दिल थम गया

कभी शादियों में ढोल की लय और “नागिन डांस” की धुन पर दिल बेक़ाबू होकर थिरक उठते थे। अब कहीं न ताल बची है, न वो मस्ती। DJ के शोर में मानो रिश्तों की गर्माहट दब गई है। दूल्हा-दुल्हन भी कैमरे की कैद में इतने बंध गए हैं कि लगता है मानो शादी नहीं, कोई बड़ा फोटोशूट चल रहा हो। कभी घरों में उठने वाली खुशी, हँसी-ठिठोली और अपनापन अब बस दिखावे की चमक में धुंधला गया है। वक्त बदल गया है पर शायद मन अब भी उसी खोई हुई सरलता, सादगी और आत्मीयता को खोज रहा है।

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लड़कों से कोई नहीं पूछता ख़ैरियत

काफ़ी वक्त हो गया है,
अब कोई नहीं पूछता लड़कों से ख़ैरियत।
किसी को दिलचस्पी नहीं रहती यह जानने में कि वो ठीक हैं या नहीं।उनसे बस पूछा जाता है उनकी हैसियत, सैलरी और सफलता के पैमाने।ज़रा-सा पीछे रह जाने पर उनके हिस्से में आती हैं . आलोचना, तंज और एक लंबी चुप्पी,जिसमें उनका मन ख़ुद से ही लड़ता रहता है।

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माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

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