गुलमोहर और रजनीगंधा
क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या किसी की खुशबू की तरह मन में हमेशा बने रहने का एहसास? ‘गुलमोहर और रजनीगंधा के नाम’ एक रूहानी और रोमांटिक पत्र है, जो प्रेम को रंगों, खुशबू और आत्मिक जुड़ाव के माध्यम से व्यक्त करता है।

क्या प्रेम केवल साथ रहने का नाम है, या किसी की खुशबू की तरह मन में हमेशा बने रहने का एहसास? ‘गुलमोहर और रजनीगंधा के नाम’ एक रूहानी और रोमांटिक पत्र है, जो प्रेम को रंगों, खुशबू और आत्मिक जुड़ाव के माध्यम से व्यक्त करता है।
घर के एक छोटे से कोने में बसे गौरैया के घोंसले ने जीवन का ऐसा पाठ सिखाया, जिसे शायद बड़ी-बड़ी किताबें भी नहीं सिखा पातीं। नन्हे पंखों की पहली उड़ान, माता-पिता का निस्वार्थ प्रेम और फिर सही समय आने पर उन्हें खुले आसमान के हवाले कर देना— यही प्रकृति का सबसे सुंदर संदेश है। गौरैया के बच्चों की विदाई ने यह एहसास कराया कि सच्चा प्रेम किसी को बाँधता नहीं, बल्कि उसे इतना सक्षम बनाता है कि वह आत्मविश्वास के साथ अपनी राह चुन सके।
आज घरों में सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन रिश्तों में समय और अपनापन कम होता जा रहा है। यह लेख सिर्फ संयुक्त परिवारों के टूटने की नहीं, इंसानों के भीतर बढ़ते अकेलेपन की कहानी है।”
रात की खामोशी, अधूरी चाय और बालकनी में बैठा एक व्यक्ति जो एक ऐसी स्त्री को याद कर रहा है, जिसने उसे सिखाया कि सपनों को जिम्मेदारियों के बीच भी जिंदा रखा जा सकता है।
यह लेख एक ऐसे अनमोल रिश्ते की भावनात्मक अभिव्यक्ति है, जहाँ एक लड़की “पार्थ” कहकर केवल पुकारती नहीं, बल्कि टूटते हुए मन को साहस, अपनापन और पहचान भी देती है।
“स्मृति नाद” अपूर्वा की ऐसी काव्य कृति है, जो स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के गहरे संसार को सजीव करती है। इसमें मां, पिता और बचपन से जुड़ी अनुभूतियां इतनी सजीव हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीने लगता है।
माएं कभी बूढ़ी नहीं होतीं, उनकी उम्र भले ही बढ़ जाए, लेकिन ममता हमेशा जवान रहती है. जिस मां ने अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में समर्पित कर दिया, वही मां एक समय ऐसा भी देखती है जब उसकी चिंता बच्चों को बोझ लगने लगती है. यह लेख उसी बदलते रिश्ते की सच्चाई और मां के त्याग को गहराई से महसूस कराने की एक संवेदनशील कोशिश है.
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद रंग ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते हैं।जीवन में हर रंग अपनी अहमियत दर्ज कराने समय-समय पर चला आता है। अमूमन हम नीले, पीले, हरे और सबसे पुराने रंगगुलाबी के बारे में जानते हैं। रंग ज़िंदगी में हों या शब्दों में… वे खुद को बयां कर ही देते हैं। आइए जानते हैं,…
उनके पर्स के किसी कोने में मेरा दिल रखा है—मेकअप की चीज़ों से घिरा हुआ। दिल कभी शिकायत करता है, कभी जिद करता है कि उसे वहीं रहने दो। वजह बड़ी मासूम है जब भी वह पर्स खोलती हैं, उनकी उँगलियों का स्पर्श दिल को ऐसा सुकून देता है कि सारी चुभन भूल जाती है। दिल मानता है कि सबसे महफ़ूज़ और मीठी जगह वही है, जहाँ अहसास बिना बोले छू लेते हैं।
सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।