प्रेम, खुशबू और रूह का रिश्ता

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
जानती हो रिद्धिमा,
तुमने प्रेम को फूलों में ढालकर जो कहा, उसे पढ़ते हुए लगा जैसे किसी ने मेरे मन की सूनी पगडंडी पर चुपके से रजनीगंधा की कुछ कलियाँ बिखेर दी हों.
तुम कहती हो कि मैं गुलमोहर हूँधूप में खिलता हुआ, रंगों से भरा हुआ.
पर सच तो यह है कि रंगों का भी क्या अर्थ, अगर उन्हें कोई महसूस करने वाला न हो? मेरे भीतर जो भी उजाला है, वह शायद तुम्हारी उस अनकही खुशबू से ही है, जो बिना दस्तक दिए मेरे दिनों में उतर आती है.
गुलमोहर को लोग दूर से देखकर प्रेम कर लेते हैं, उसकी लालिमा पर ठहर जाते हैं. पर रजनीगंधा वह दिखती कम है, महसूस ज़्यादा होती है. उसकी महक धीरे-धीरे दिल में उतरती है और फिर वहीं ठहर जाती है.
और तुम भी तो कुछ ऐसी ही हो.
तुम्हें समझना किसी किताब का आख़िरी पन्ना पढ़ लेना नहीं, बल्कि हर रोज़ तुम्हारे भीतर एक नया अध्याय खोज लेना है.
तुमने पूछा थाक्या ऐसा प्रेम सचमुच संभव है, जो आत्मा की खिड़की से भीतर आए?
मुझे लगता है, प्रेम का जन्म ही वहीं होता है.
वह आँखों से शुरू होकर आत्मा तक नहीं पहुँचता, वह पहले आत्मा को छूता है, फिर आँखों में उतरता है.
कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते, कोई परिचय नहीं चाहते, कोई मंज़िल नहीं खोजते. वे बस धीरे-धीरे हमारी धड़कनों का हिस्सा बन जाते हैं.
जैसे तुम…
कई बार तुमसे बात नहीं होती, फिर भी तुम्हारा खयाल पूरे दिन मेरे साथ चलता रहता है. कई बार तुम्हारी कोई बात याद आ जाती है और यूँ लगता है जैसे तुम अभी यहीं कहीं होमेरे पास, मेरी साँसों के आसपास.
मुझे तुम्हारी हर बात समझ आ जाए, ऐसा दावा नहीं है मेरा.
लेकिन तुम्हारी हर ख़ामोशी को सुनने की चाह ज़रूर है.
तुम्हारी आँखों में छिपे डर को पढ़ लेने की इच्छा है.
तुम्हारी मुस्कान के पीछे छिपी थकान को अपने हिस्से में बाँट लेने की इच्छा है.
मुझे तुम्हें बदलना नहीं है, रिद्धिमा.
मुझे तो बस इतना करना है कि जब दुनिया तुम्हें गलत समझे, तब तुम एक बार मेरी तऱफ देखकर कह सकोङ्घङ्घतुम समझते हो न?ङ्घङ्घ
और मैं बिना कुछ कहे मुस्कुरा दूँ.
अगर तुम रजनीगंधा हो, तो महकती रहनाअपने पूरे रहस्य, अपनी पूरी नर्मी और अपनी पूरी ख़ूबसूरती के साथ.
मैं गुलमोहर होकर भी तुम्हारी उस खुशबू का इंतज़ार करूँगा, जो हर रात चुपचाप मेरे मन के सबसे शांत कोने में उतर आती है.
और हाँ
जिस शाम की तुमने बात की थीदिन और रात के बीच वाले उस जादुई क्षण की
मैं भी उसका इंतज़ार करूँगा.
जहाँ तुम्हारी खुशबू मेरे रंगों से मिलेगी.
जहाँ तुम्हारे बालों में उलझी हवा मेरे कंधे को छूकर गुज़रेगी.
जहाँ तुम्हारी आँखें कुछ कहेंगी और मेरे पास सुनने के लिए पूरी उम्र होगी.
जहाँ शब्दों की ज़रूरत नहीं होगी, स्पर्श की भी नहीं
बस तुम्हारा होना और मेरा महसूस करना ही काफी होगा.
और उस पल शायद हम दोनों समझ जाएँगे कि कुछ प्रेम साथ रहने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे की रूह में हमेशा के लिए बस जाने के लिए होते हैं.
कुछ रूहें मिलती नहीं हैं
वे एक-दूसरे में महकती रहती हैं
ठीक वैसे ही,
जैसे गुलमोहर के रंगों में कहीं चुपचाप रजनीगंधा की खुशबू बसी रहती है.
