मैं लिखूँ

सूखी नदी, कूड़े के पहाड़ और प्लास्टिक से ढके शहर को देखते हुए एक लेखिका डायरी में लिखती हुई, पर्यावरणीय चिंता और संवेदनशीलता को दर्शाता दृश्य।

किरण अग्रवाल, उत्तरायण, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

सोचती हूँ, न लिखूँ
सूखी सरिता,
निर्वस्त्र कानन,
कूड़े का पहाड़,
जगह-जगह खड़ी जर्जर गाड़ियाँ,
नदियों में टूटे-फूटे बोतलों के टुकड़े,
प्लास्टिक से ढका शहर,
पतझड़ का मौसम,
और भी बहुत कुछ न लिखूँ!

लेकिन न जाने कहाँ से
मेरी राहों में
इनका आना हो ही जाता है,
और मैं अभिनय करती हूँ
कि मैंने आज इन्हें नहीं देखा,
और मैं सोचती हूँ
“कुछ भी न लिखूँ!”

यह नहीं है कि
मैं और कई प्राकृतिक सौंदर्यों को
नहीं देखती।
देखती हूँ,
अभिभूत होती हूँ,
सृष्टि का आभार भी व्यक्त करती हूँ!

कुछ दृश्य चलते हैं
फिल्म की रील की तरह
दिलों-दिमाग में।
विचारों में उथल-पुथल होती है।

फिर सोचती हूँ
“मैं लिखूँ,
और लिखती रहूँ,
जब तक दृश्य परिवर्तित नहीं हो जाता,
मैं लिखूँ!”

इन रचनाओं को अवश्य पढ़ें-

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मैं लिखूँ
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