सभाकक्ष में लकड़ी की मेज, कुर्सियां और बाहर खड़ा अकेला पेड़ – पर्यावरण पर आधारित हिंदी कविता 'लकड़ी का सम्मेलन' का प्रतीकात्मक दृश्य।

लकड़ी का सम्मेलन

लकड़ी का सम्मेलन’ एक सशक्त समकालीन हिंदी कविता है, जिसमें सभ्यता, पर्यावरण और मनुष्य के पाखंड पर तीखा व्यंग्य किया गया है। कविता बताती है कि पेड़ों की रक्षा के भाषण अक्सर उन्हीं लकड़ियों के बीच दिए जाते हैं, जिनकी देह कभी जंगल हुआ करती थी।

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सूखी नदी, कूड़े के पहाड़ और प्लास्टिक से ढके शहर को देखते हुए एक लेखिका डायरी में लिखती हुई, पर्यावरणीय चिंता और संवेदनशीलता को दर्शाता दृश्य।

मैं लिखूँ

जब प्रकृति घायल हो, नदियाँ सूख जाएँ, शहर प्लास्टिक से ढक जाएँ और चारों ओर पर्यावरणीय संकट दिखाई दे, तब संवेदनशील मन चुप नहीं रह पाता। ‘मैं लिखूँ’ कविता उसी बेचैनी, जिम्मेदारी और परिवर्तन की उम्मीद का सशक्त स्वर है।

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स्वर्णिम प्रभात की सुनहरी किरणें जब धरती को आलोकित करती हैं, तब प्रकृति का हर कण जीवन, सौंदर्य और नवचेतना का संदेश देता है

स्वर्णिम प्रभात

स्वर्णिम प्रभात की सुनहरी किरणों से आलोकित यह कविता प्रकृति के अनुपम सौंदर्य, पक्षियों के मधुर कलरव, उषा की मनोहारी लालिमा और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह रचना प्रकृति के प्रति प्रेम, कृतज्ञता और संरक्षण की भावना जागृत करती है।

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नीले आकाश, हरे-भरे जंगलों, पर्वतों, नदी और झरनों से सजा प्राकृतिक दृश्य, जहाँ एक व्यक्ति पौधा लगा रहा है। आसपास पक्षी और वन्यजीव दिखाई दे रहे हैं, जो पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और धरती माता की सुंदरता का संदेश दे रहे हैं।

नीला अम्बर, स्वच्छ पवन

“नीला अम्बर, स्वच्छ पवन है” कविता प्रकृति की सुंदरता, जैव विविधता और धरती माता के प्रति मानव के कर्तव्यों को दर्शाती है। यह रचना पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का सशक्त संदेश देती है।

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विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पेड़ लगाते लोग, हरित प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता यथार्थवादी दृश्य।

प्रकृति बदला नहीं लेती, केवल हिसाब बराबर करती है

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह लेख प्रकृति और मानव के संबंधों पर गंभीर चिंतन करता है। इसमें बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वृक्षों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व बताया गया है। लेख यह संदेश देता है कि प्रकृति बदला नहीं लेती, बल्कि समय आने पर अपने साथ किए गए व्यवहार का हिसाब बराबर करती है।

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आदिवासी गोदना से प्रेरित धरती पर उकेरी हरियाली, जंगल, नदियाँ और वृक्षों का प्रतीकात्मक कलात्मक दृश्य।

गोदना

‘गोदना’ कविता आदिवासी परंपरा और प्रकृति के गहरे संबंध को रूपक बनाकर धरती पर जंगलों और हरियाली को स्थायी पहचान की तरह सहेजने का संदेश देती है। यह कविता पर्यावरण, स्मृति और जीवन के सौंदर्य का हरित घोषणापत्र बन जाती है।

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गर्मी के मौसम में पौधों और हरियाली से सजा एक भारतीय घर का टेरेस गार्डन, जो शुद्ध हवा और ठंडक प्रदान कर रहा है।

गर्मी से राहत का हरा समाधान : टेरेस गार्डन

भीषण गर्मी और बढ़ते प्रदूषण के दौर में टेरेस गार्डन एक प्रभावी और सरल समाधान बनकर उभर रहा है। यह न केवल घर की छत को ठंडा रखने और तापमान नियंत्रित करने में मदद करता है, बल्कि शुद्ध हवा, हरियाली और मानसिक शांति भी प्रदान करता है। छोटे-छोटे पौधों और किचन गार्डन के माध्यम से हम पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

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प्रदूषित शहर में झोपड़ी के पास खड़ी महिला धुएँ से भरे आसमान को देखते हुए

ज़हरीली हवाएँ

रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।

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छोटी गौरैया चिड़िया तिनका लेकर घोंसला बनाती हुई

गौरैया

“गौरैया” एक संवेदनशील और सरल भाषा में लिखी गई ऐसी कविता है, जो नन्हीं चिड़िया के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश देती है। यह कविता हमें उस दुनिया की याद दिलाती है, जहाँ कभी गौरैया की चहचहाहट हर आँगन की पहचान हुआ करती थी।

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बसेरा

‘बसेरा’ एक संवेदनशील लघुकथा है, जिसमें पेड़ और चिड़ियों के संवाद के माध्यम से विकास और विनाश के द्वंद्व को उकेरा गया है। यह कथा प्रकृति, सह-अस्तित्व और मानवीय हस्तक्षेप के कारण उजड़ते आश्रयों की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाती है।

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