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अरावली : सभ्यता, प्रकृति और भविष्य की पुकार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर

अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत ृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग 2.5 अरब वर्ष मानी जाती है. यह केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि भारत के उत्तर-पश्चिमी भूभाग की प्राकृतिक जीवनरेखा है. गुजरात से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर में फैली यह पर्वतृंखला थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने वाली एक मजबूत प्राकृतिक दीवार की तरह कार्य करती है. अरावली न केवल मानसून की दिशा और प्रभाव को नियंत्रित करती है, बल्कि भूजल संरक्षण और पुनर्भरण में भी इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. अनेक नदियों का उद्गम स्थल होने के साथ-साथ यह संगमरमर एवं अन्य खनिज संपदाओं का भंडार भी है. माउंट आबू स्थित गुरु शिखर (1722 मीटर) इसकी सर्वोच्च चोटी है. दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के लिए अरावली को अक्सर ग्रीन लंग्स कहा जाता है. यह वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने, तापमान संतुलित रखने और जैव विविधता को संरक्षण देने का कार्य करती है. यहां असंख्य वन्यजीवों और वनस्पतियों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से कई आज विलुप्ति के कगार पर हैं.
विवाद की जड़: सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट
नवंबर 2025 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में टी.एन. गोडावर्मन केस के अंतर्गत एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया. इस रिपोर्ट में दो गंभीर प्रस्ताव रखे गए.जिन पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है, उन्हें अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा. जिन दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से कम है, वे भी अरावली के अंतर्गत नहीं आएंगी.चूंकि अरावली करोड़ों वर्षों की प्राकृतिक क्षरण प्रक्रिया से गुजर चुकी है, इसलिए इसके अधिकांश हिस्से आज 100 मीटर से कम ऊंचाई के हैं. इस परिभाषा के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र अरावली नहीं रह जाएगा.
खतरे की घंटी
यदि यह निर्णय लागू होता है तो अरावली का बड़ा हिस्सा वन संरक्षण अधिनियम के दायरे से बाहर हो जाएगा. इसका सीधा अर्थ होगाअवैध खनन, जंगलों की कटाई और पारिस्थितिक विनाश पर कोई प्रभावी रोक नहीं.अरावली के जंगलों में यदि खनन शुरू हुआ, तो केवल पेड़-पौधे नहीं कटेंगे, बल्कि भूजल स्तर गिरेगा, मरुस्थल का विस्तार होगा, तापमान बढ़ेगा और प्रदूषण असहनीय हो जाएगा. यह नुकसान केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का होगा.
यह सिर्फ पहाड़ नहीं, हमारी विरासत है
अरावली कोई सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि हमारा इतिहास, हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर है. कुछ लालची तत्वों और नीतिगत लापरवाहियों के कारण यदि यह धरोहर नष्ट होती है, तो इसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी.अरावली को बचाना केवल पर्यावरणविदों की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है. सरकार को चाहिए कि वह अल्पकालिक आर्थिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दे.
अरावली बचेगी, तभी भारत का पर्यावरण, इतिहास और भविष्य बचेगा.

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