क्या जानवरों के पास है मौसम की छठी इंद्रिय
जब आसमान साफ हो और अचानक पक्षी नीचे उड़ने लगें, मेंढक शोर मचाने लगें या पालतू जानवर बेचैन हो जाएं, तो बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं, “आज बारिश होने वाली है.” सवाल यह है कि क्या जानवर सच में मौसम की आहट पहले सुन लेते हैं. विज्ञान कहता है, हां, लेकिन एक अलग तरीके से.
जानवर मौसम की भविष्यवाणी इंसानों की तरह नहीं करते, लेकिन वे वातावरण में हो रहे बेहद महीन बदलावों को महसूस कर लेते हैं. जहां इंसान केवल बादलों और तापमान पर ध्यान देता है, वहीं जानवर वायुदाब, नमी, गंध और ध्वनि में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तनों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं. यही वजह है कि तूफान या भारी बारिश से पहले उनका व्यवहार अचानक बदल जाता है.
वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों की इंद्रियां इंसानों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील होती हैं. वे हवा के दबाव में हल्की गिरावट, वातावरण में नमी की बढ़ोतरी और यहां तक कि धरती में होने वाली हलचल तक को महसूस कर सकते हैं. इंसान जिन संकेतों को नजरअंदाज कर देता है, वही संकेत जानवरों के लिए चेतावनी बन जाते हैं.
ग्राउंडहॉग की कहानी इसी संवेदनशीलता का सबसे चर्चित उदाहरण है. अमेरिका में हर साल 2 फरवरी को पनक्ससुटॉनी फिल नाम का ग्राउंडहॉग अपने बिल से बाहर निकलता है और वसंत के आगमन का संकेत देता है. मान्यता है कि अगर उसे अपनी परछाईं दिख जाए तो सर्दी लंबी चलेगी, और अगर परछाईं न दिखे तो वसंत जल्दी आएगा. भले ही यह परंपरा वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित न हो, लेकिन यह जरूर दिखाती है कि जानवरों की जैविक घड़ियां ऋतु परिवर्तन से गहराई से जुड़ी होती हैं.
पक्षियों का व्यवहार भी मौसम का मूक संकेत देता है. तूफान से पहले कई पक्षी कम ऊंचाई पर उड़ने लगते हैं या अचानक दिशा बदल लेते हैं. वैज्ञानिक मानते हैं कि कुछ प्रवासी पक्षी इन्फ्रासाउंड यानी बेहद कम आवृत्ति वाली ध्वनियां सुन सकते हैं, जो बड़े तूफान या मौसमीय उथल-पुथल से पहले उत्पन्न होती हैं. इंसानों को ये आवाजें सुनाई नहीं देतीं, लेकिन पक्षी इन्हें खतरे के संकेत के रूप में पहचान लेते हैं.
मेंढक, झींगुर और अन्य कीट बारिश से पहले अचानक ज्यादा आवाज करने लगते हैं. इसका कारण रोमांच नहीं, बल्कि विज्ञान है. बारिश से पहले नमी और वायुदाब में बदलाव होता है, जिस पर ये जीव तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं. यही कारण है कि गांवों में आज भी मेंढकों की आवाज को बारिश का संकेत माना जाता है.
आधुनिक मौसम विज्ञान भी किसी न किसी रूप में इन्हीं संकेतों पर आधारित है. फर्क सिर्फ इतना है कि आज इंसान इन बदलावों को मशीनों से मापता है, जबकि जानवर उन्हें स्वाभाविक रूप से महसूस करते हैं. तकनीक के आने से बहुत पहले मानव समाज जानवरों के व्यवहार को देखकर मौसम का अनुमान लगाया करता था.
निष्कर्ष साफ है. जानवर मौसम की भविष्यवाणी नहीं करते, लेकिन वे मौसम के आने से पहले उसकी आहट जरूर पकड़ लेते हैं. शायद इसी वजह से प्रकृति हमें बार-बार यह सिखाती है कि ज्ञान केवल तकनीक से नहीं, बल्कि संवेदनशील इंद्रियों और अनुभव से भी आता है.
