मेरी बेटियों

विवाह के प्रतीकात्मक वातावरण में एक भारतीय माँ अपनी बेटी का हाथ थामे खड़ी है, जो आत्मसम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र पहचान का संदेश देती है।
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संध्या यादव, मुंबई

तुम्हारी शादी में नहीं बजेंगे रिकॉर्ड पर ऐसे गीत-
“बाबुल का ये घर गोरी, कुछ दिन का ठिकाना है…”

पाणिग्रहण की हर रस्म मन-निष्ठा से निभाऊँगी,
पर कन्यादान संस्कार मैं कदापि नहीं कर पाऊँगी…

शगुन का हर लिफाफा, जिसमें “एडजस्ट” करने की
भारी-भरकम रकम रस्मन भरी होगी मेरी बेटियों,
मैं बिना हाथ लगाए निश्चित ही वापस लौटाऊँगी,
ताने, उपेक्षा और मनबढ़नी का आरोप भी झेल जाऊँगी…

पूरी श्रद्धा और सम्मान से पंडितजी से अनुरोध कर,
सात वचनों में संशोधन की विनती भी कर जाऊँगी।
बेटी को गाय नहीं, इंसान बनाकर पाला-पोसा है-
कुंडली मिलाने से पहले यह बात ज़रूर बताऊँगी…

तुम्हारे नए घर की चौखट पर, हाथ जोड़ तुम्हारा हाथ थाम,
तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को यह बात ज़रूर बताऊँगी-
आपसी समझ और समझौते की सीमा तय रखना,
तुम्हारे साथ नए परिवार से भी यही आग्रह कर पाऊँगी।

नहीं निभ पाए अगर किसी कारणवश तुमसे रिश्ता,
नीला ड्रम, रस्सी, नींद की गोलियाँ, नदी या कोई हथियार
बाज़ार में तलाशने से पहले लौट जाना अपने-अपने रास्ते।
श्मशान से पहले अदालत चुनना-
बस यही गीत सुनाऊँगी…

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