टूटी हुई कठपुतली की डोरियों के साथ आत्मविश्वास से खड़ी एक भारतीय महिला, जिसके चेहरे पर आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और नई शुरुआत का भाव झलक रहा है। पृष्ठभूमि में अंधकार से उजाले की ओर जाता दृश्य नारी सशक्तिकरण और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक है।

कठपुतली

‘कठपुतली’ एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है, जो स्त्री को केवल रिश्तों या सामाजिक बंधनों तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे सृजन, चेतना, आत्मसम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक मानती है। कविता यह संदेश देती है कि स्त्री किसी की कठपुतली नहीं, बल्कि अपने जीवन की स्वयं निर्माता है। संवेदनशील शब्दों और सशक्त भावों से सजी यह रचना नारी सम्मान, समानता और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती है।

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साहित्य पुरस्कार प्राप्त करती मुस्कुराती महिला, जिसके चेहरे पर संघर्ष से मिली सफलता की चमक है।

अव्वल दर्जे की बेवकूफ़

बार-बार ‘अव्वल दर्जे की बेवकूफ़’ कहकर अपमानित की गई सीमा ने हार नहीं मानी। धैर्य, संघर्ष और अपनी लेखनी के बल पर उसने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी जीत भी हासिल की। यह एक संवेदनशील और प्रेरक हिंदी कहानी है।

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हाँ, मौन हूँ मैं कहानी

हाँ, मौन हूँ मैं

कभी-कभी स्त्री इसलिए मौन नहीं होती कि उसके पास कहने को कुछ नहीं होता, बल्कि इसलिए कि उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं होता। ‘हाँ, मौन हूँ मैं’ एक ऐसी लेखिका की कहानी है, जिसने अपने प्रेम और रिश्ते को बचाने के लिए अपने सपनों को चुप करा दिया, लेकिन अंततः उसका मौन समझा गया और उसके शब्दों ने फिर जन्म लिया।

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आईने के सामने खड़ी एक भारतीय महिला, जो परिवार की जिम्मेदारियों के बीच स्वयं की पहचान और आत्ममंथन में खोई हुई दिखाई दे रही है।

स्त्री : एक मुलाकात

‘स्त्री – एक मुलाकात’ एक मार्मिक कविता है, जो उस स्त्री की कहानी कहती है जो परिवार, बच्चों और जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते स्वयं से दूर हो जाती है। यह कविता स्त्री के त्याग, उसकी अनदेखी इच्छाओं और अपनी पहचान से पुनः मिलने की आकांक्षा को संवेदनशीलता से व्यक्त करती है।

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विवाह के प्रतीकात्मक वातावरण में एक भारतीय माँ अपनी बेटी का हाथ थामे खड़ी है, जो आत्मसम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्र पहचान का संदेश देती है।

मेरी बेटियों

“मेरी बेटियों” केवल विवाह पर लिखी कविता नहीं, बल्कि बेटियों के आत्मसम्मान, स्वतंत्र पहचान और रिश्तों में गरिमा की बात करने वाली संवेदनशील अभिव्यक्ति है। यह कविता कन्यादान, सामाजिक अपेक्षाओं और समझौते की सीमाओं पर प्रश्न उठाते हुए बेटियों को यह संदेश देती है कि किसी भी रिश्ते से पहले उनका जीवन और सम्मान महत्वपूर्ण है।

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एक छोटी लड़की चूल्हे और किताबों के बीच खड़ी, पढ़ाई और अपने सपनों की ओर बढ़ने की इच्छा दर्शाती हुई।

चूल्हे से किताब तक

खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…

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आत्मविश्वास से भरी महिला, आईने के सामने खड़ी, अपनी पहचान और सच्चाई को दर्शाती हुई

कविता हूँ मैं

कविता हूँ मैं’ एक सशक्त और बेबाक रचना है, जो स्त्री के आत्मसम्मान, पहचान और सच को उजागर करती है। यह कविता समाज की संकीर्ण सोच पर तीखा प्रहार करते हुए खुद को आईने की तरह प्रस्तुत करती है, जो सच्चाई को ज्यों का त्यों दिखाती है।

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खामोश बैठी महिला, समाज की बंदिशों और अंदरूनी घुटन को दर्शाती हुई

तुम चुप रहो

“तुम चुप रहो” एक तीखी और प्रभावशाली हिंदी कविता है, जो समाज में दबाई गई आवाज़ों, विशेषकर महिलाओं की घुटन और संघर्ष को दर्शाती है। यह रचना सवाल उठाती है क्या चुप रहना ही समाधान है या अन्याय के खिलाफ बोलना जरूरी है?

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अपनी बेटी का हाथ थामे आत्मविश्वास से आगे बढ़ती माँ, नए शहर की पृष्ठभूमि में उगता सूरज

मुक्ति की उड़ान…

“मुक्ति की उड़ान” एक सशक्त कहानी है जो दर्शाती है कि जब एक माँ अपने आत्मसम्मान और बेटी के भविष्य के लिए खड़ी होती है, तो वह समाज की हर रूढ़ि को तोड़ सकती है। यह कहानी नारी साहस, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है।

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