
भगवती सक्सेना गौड़, बैंगलोर
तुम स्त्रियोचित गुण मत खोना,
आकाश की ऊँचाइयों को छूना,
कार चलाना, चाहे प्लेन चलाना,
स्पेस की सैर भी हिम्मत से करना!
तुम सहज स्नेह ही बाँटते रहना,
किसी भी हालत में आधी रात में,
संतान घर में सोता छोड़ न जाना,
महात्मा नहीं, बदचलन कहलाओगी!
तुम स्त्रियोचित गुण मत खोना,
घर का दीप तुमसे ही उजियारा है,
व्यंजन छूकर प्रसाद बनाती हो,
मकान को तुम ही घर बनाती हो!
कोर्ट में जज बनकर ऑर्डर करना,
घर में हमेशा ममता ही परोसना,
तुम स्त्रियोचित गुण मत खोना!!
