“बाजोट”: रिश्तों के आईने में झांकता सच

“बाजोट कहानी संग्रह की थीम दर्शाता भारतीय पारिवारिक और सामाजिक दृश्य”

मीनाक्षी पारीक, जयपुर

समकालीन हिंदी साहित्य में जब जीवन की जटिलताओं, रिश्तों के विघटन और मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व को केंद्र में रखकर लेखन की बात होती है, तब कहानीकार हरीश बी शर्मा का कहानी संग्रह “बाजोट” एक सशक्त हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। यह संग्रह मात्र कहानियों का संकलन नहीं, बल्कि भारतीय समाज के बदलते मनोविज्ञान और संवेदनात्मक परिदृश्य का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता और मनोवैज्ञानिक गहराई है। इसमें संकलित दसों कहानियाँ अलग-अलग सामाजिक संदर्भों और मानवीय अनुभवों को सामने लाती हैं, किंतु उनका मूल स्वर आत्ममंथन और आत्मबोध की ओर उन्मुख है।

लेखक ने अत्यंत साधारण पात्रों और घटनाओं के माध्यम से असाधारण सच्चाइयों को उद्घाटित किया है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर देती हैं। संग्रह की शीर्षक कहानी “बाजोट” स्त्री मन के अंतर्द्वंद्व, सामाजिक आडंबर और आत्मस्वीकृति की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। किटी पार्टी के बहाने रची गई यह कथा धीरे-धीरे आत्ममंथन की एक गंभीर सभा में परिवर्तित हो जाती है, जहाँ पात्र अपने भीतर छिपे खालीपन और असंतोष से रूबरू होते हैं। यहाँ ‘बाजोट’ एक प्रतीक बनकर उभरता है—जीवन के उन मंचों का, जहाँ सच सामने आता है।दूसरी ओर, “साथ” जैसी कहानी रिश्तों की सूक्ष्म परतों को उधेड़ते हुए यह प्रश्न खड़ा करती है कि क्या साथ केवल भौतिक निकटता है या आत्मिक जुड़ाव भी आवश्यक है। वहीं “टारगेट” आधुनिक कॉर्पोरेट जीवन की कठोरता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को मार्मिकता से प्रस्तुत करती है। यह कहानी आज के युवा वर्ग की मानसिक पीड़ा और अस्तित्वगत संकट का सजीव चित्रण है।

“अपराध बोध” मनुष्य के अंतःकरण की उस अदालत को सामने लाती है, जहाँ सबसे कठोर न्याय स्वयं के भीतर होता है। वहीं “परवाह” सामाजिक ढांचे में व्याप्त लैंगिक असमानता और पारिवारिक विघटन को उजागर करती है। “पोर्न स्टोरी” अपने चौंकाने वाले शीर्षक के बावजूद, शब्दों के बाजारीकरण और संवेदनाओं के अवमूल्यन की गंभीर पड़ताल करती है।“ओवर ऐज” और “क्रश” जैसी कहानियाँ जीवन के छूटते अवसरों और भावनात्मक असमंजस को गहराई से छूती हैं, जबकि “लाजबाब” बौद्धिक संवादों के माध्यम से अस्तित्व और जन्म जैसे दार्शनिक प्रश्नों को उठाती है।

संग्रह की अंतिम कहानी “काशी काका” वैराग्य, मोह-माया और जीवन के गूढ़ सत्य की ओर ले जाने वाली अत्यंत प्रभावशाली रचना है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक बनी रहती है।भाषा की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और प्रभावशाली है। लेखक ने बिना किसी आडंबर के जीवन की सच्चाइयों को अभिव्यक्त किया है। बीकानेर की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि कथाओं को स्थानीय रंग और जीवंतता प्रदान करती है। साथ ही, राजस्थानी से हिंदी में अनूदित होने के बावजूद भावों की प्रामाणिकता कहीं भी क्षीण नहीं होती।

समग्रतः, “बाजोट” एक ऐसी कृति है जो पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करती है। यह संग्रह यह स्थापित करता है कि साहित्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मबोध और सामाजिक जागरूकता भी है। निःसंदेह, यह कहानी संग्रह हिंदी साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने की क्षमता रखता है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से पठनीय है, जो साहित्य में गहराई, संवेदना और चिंतन की तलाश करते हैं।

पुस्तक बाजोट की समीक्षा जयपुर की प्रसिद्ध लेखिका मीनाक्षी पारीक ने बहुत ही सुंदर और विस्तृत रूप से की है..लेकिन इसका संपादित अंश ही यहां प्रकाशित किया जा रहा है
-संपादक



One thought on ““बाजोट”: रिश्तों के आईने में झांकता सच

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