साड़ी में खड़ी एक बहू, पीछे धुंधली पारिवारिक पृष्ठभूमि, चेहरे पर मिश्रित भावनाएँ

बेटी से बहू कब बन गई…?

यह लेख दर्शाता है कि किस तरह एक लड़की शादी के बाद बेटी से बहू बन जाती है, और कैसे समय आने पर उससे बेटी जैसा व्यवहार अपेक्षित किया जाता है। यह लेख रिश्तों में सच्चे अपनापन और समान सम्मान की आवश्यकता पर भावनात्मक प्रकाश डालता है।

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खिड़की के पास बैठा लेखक, वैचारिक लेखन में डूबा हुआ दृश्य

ज्ञान नहीं, बदलाव लिखिए

लेखन का उद्देश्य केवल ज्ञान बाँटना नहीं, बल्कि स्वयं से शुरू होने वाला परिवर्तन होना चाहिए। जब लेखन आत्मचिंतन बनता है, तभी वह समाज को दिशा देता है।

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स्वतंत्र और आत्मविश्वासी भारतीय महिला नारी अधिकार और समानता का प्रतीक बनकर खड़ी

मैं नारी हूँ जागीर नहीं

यह कविता नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की बुलंद आवाज़ है। समाज में स्त्री को जागीर समझने की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती यह रचना समानता और सम्मान की माँग करती है।

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महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर अत्याचार बढ़े

यह लेख भारतीय समाज में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और जनजाति समुदायों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर केंद्रित है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसमें घरेलू हिंसा, दहेज हत्याएं, अपहरण, बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले प्रमुख हैं। बच्चों पर अत्याचारों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है, और बुजुर्ग व जनजाति समुदाय भी सुरक्षित नहीं हैं। लेख में यह भी बताया गया है कि केवल कानून और पुलिस की तत्परता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलना और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना अनिवार्य है। यह स्थिति संकेत देती है कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।

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हस्‍तरेखा

मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने हथेली फैलाई। बाबा ने ध्यान से रेखाएँ देखीं और मुस्कराए
“अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब सुख-संपत्ति और अच्छा पति मिलेगा।” वह अचानक बीच में बोल उठी—“विद्या की रेखा कहाँ है मेरे हाथ में, बताइए तो ज़रा?”बाबा ठिठक गए।“बिटिया, तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।”उसकी आँखों में चमक आ गई।

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हश्र..

आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।

कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।

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रंगोली

दिवाली नज़दीक थी, और हर साल की तरह श्रद्धा को ससुराल में ही त्योहार मनाना था, जबकि उसका मायका दो गली छोड़कर ही था। शादी के बाद से उसने कभी भी दिवाली के दिनों में माँ के आँगन में रंगोली नहीं बनाई, क्योंकि सास को उसका मायके जाना पसंद नहीं था। हर दिन वह ससुराल के आँगन में रंगोली बनाती, पर मन माँ के खाली आँगन में बसता, जहाँ अब रौनक खत्म हो चुकी थी। एक-दो बार मायके जाकर उसने देखा कि माँ आसपास के बच्चों से छोटी-सी रंगोली बनवाती हैं, पर न माँ ने उससे आने को कहा, न वह कह पाई। बात छोटी थी, पर कहने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाई। उसे हमेशा यह दर्द रहा कि वह बेटी होकर भी अपने घर जाने के लिए ससुरालवालों की अनुमति पर निर्भर है—शायद इसी वजह से लोग बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद अपने ही घर के लिए पराई हो जाती हैं।

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जो दिखता है, वह पूरा नहीं स्त्री जीवन के अनकहे अध्याय

शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”

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बेचन मामा

मुन्नी शायद पाँच साल की थी जब पहली बार उसे मामा के घर भेजा गया। बचपन से ही माता-पिता से दूर रहकर उसने बड़े लोगों के साए में अपना जीवन काटा — कभी बड़ी अम्मा के यहाँ, तो कभी बुआ के पास। पर मुन्नी के जीवन में सबसे कोमल, सबसे निर्मल प्रेम अगर किसी ने उसे दिया तो वो थे बेचन मामा। बेचन मामा के घर में मुन्नी ने पहली बार वो स्नेह पाया जो शायद एक बच्चा माँ-बाप से चाहता है। उनके साथ वह खेलती, रूठती, मनाती और उनके साये में हर डर भूल जाती।

बेचन मामा के बनाए कंडों की कलमों से लिखते हुए उसकी पटरी सबसे चमकती थी, और मामा की सिखाई हुई सुंदर लिखावट में उसका नाम लिखा जाता था। समय के साथ मुन्नी ने जाना कि बचपन में जो छाया उसे मिली, वह सामान्य नहीं थी — वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो हर किसी के हिस्से में कहाँ आती है।

पन्द्रह साल बाद जब वह फिर मामा के घर लौटी, तो उसकी आँखें नम थीं, लेकिन दिल भरा हुआ — मामा की वही मुस्कान, वही स्नेह और वही अपनापन देखकर। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “हे ईश्वर, हर बच्ची को एक बेचन मामा जरूर मिले

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