
रुचि अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
मैं नारी हूँ जागीर नहीं
क्यों आजाद जीवन की हकदार नहीं ?
मैं नहीं किसी की कठपुतली
प्रताड़ना मुझे स्वीकार नहीं ।
हाथों में गर पहनू चूड़ी
तो क्या बल कम हो जाता है
गृहणी बन जब करू मै सेवा
क्यों मान ना दिया जाता है ?
मरकर जन्म दिया जिस शिशु को
क्यों वंशज पिता का कहलाता है
क्यों मेरा मेरे अंश पर से
अधिकार घटाया जाता है ?
रहते है हम सबकी सुनके
पर गुलामी नहीं स्वीकारी है
ये हमारा निस्वार्थ प्रेम है
ना ही कोई लाचारी है ।
सबकी खुशियों की परवाह कर
खुद को पीछे रखते हैं
वही लोग हमें सबसे ज्यादा
क्यों बेमोल समझते हैं ?
हमारे त्याग और प्रेम का
क्या यही प्रतिकार है ?
हम नारी है जागीर नहीं
हमे भी स्वतंत्रता से जीने का , पूर्ण अधिकार है ।

शानदार …खूबसूरत.. आगाज…बेहतरीन अंदाज👏👏
सही कहा है स्वंत्रता से जीने का पूरा अधिकार है।
बहोत सुंदर आपके भाव👍👍👍👍
Bahut accha likha