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स्वतंत्र और आत्मविश्वासी भारतीय महिला नारी अधिकार और समानता का प्रतीक बनकर खड़ी

मैं नारी हूँ जागीर नहीं

यह कविता नारी की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों की बुलंद आवाज़ है। समाज में स्त्री को जागीर समझने की मानसिकता पर तीखा प्रहार करती यह रचना समानता और सम्मान की माँग करती है।

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नारी देह, प्रकृति और समाज की दोहरी नैतिकता

यह सशक्त वैचारिक निबंध नारी, देह और समाज की दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाता है। गाँव और शहर की स्त्रियों के दृष्टिकोण, सेक्स को लेकर समाज की संकीर्णता और प्रकृति के सहज संतुलन को केंद्र में रखते हुए लेख स्त्री-विमर्श को एक गहरे दार्शनिक स्तर पर ले जाता है।

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सर्टिफिकेट

सिर्फ़ शादी होना सर्टिफिकेट नहीं होता, माँ!” — अनीता की ये बात एक सशक्त सामाजिक सवाल खड़ा करती है: क्या एक स्त्री की स्वतंत्रता और निर्णय का मापदंड सिर्फ विवाह होना चाहिए?

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