
क्षमा श्रीवास्तव, देवरिया
मन का तरुवर सूख रहा है, आँखें भी ऐसे पथराई।
अग्निपरीक्षा हुई है मेरी, पीर कहूँ कैसे रघुराई।।
मास दिवस का आतप झेला, सावन-भादों करे लड़ाई।
एक विरहन की व्यथा न देखी, दिखे न क्यों मन की गहराई।
इंतजार की कठिन तपस्या और प्रतीक्षा का संयम से,
करुण वेदना, नश्वर जीवन, ताप सहे कितना तरुणाई।।
कल-कल जो करती थी गंगा, सखी देख न वो करुणाई।
पल-पल साँसों की तारों को रोका है मैंने, रघुराई।।
शीश महल के सुख को त्यागकर, जनक दुलारी संग हो चली।
प्रश्नों के जो समीकरण थे, हल उनके भी रंग हो चली।
मान बढ़ाने अवधपुरी का, बनने को प्रतीक समय का,
तज कर सारे वैभव सुख के, हृदय-नयन सब ढंग हो चली।
क्या जीवन की अग्निशाला हवन-होम करके मानेगी?
सात वचन के सात नियम में, अब दुश्वार हुई जुदाई।
अग्निपरीक्षा हुई है मेरी, पीर कहूँ कैसे रघुराई।।
थी मेरी क्या त्रुटि, बता दो, अंतर की पीड़ा समझा दो।
कर्तव्यों की वेदी पर नारी की गरिमा बतला दो।
राजधर्म की लाज बचाने, अवरोधक हूँ, कहाँ बता दो।
भाव-विहीन वेदना जिनके, उनके आगे अश्रु दिखा दो।।
दशा हमारी देख इस समय, रोती है अब धरती माई।
अग्निपरीक्षा हुई है मेरी, पीर कहूँ कैसे रघुराई।।
