अग्निपरीक्षा हुई है मेरी
अग्निपरीक्षा, विरह और प्रतीक्षा की पीड़ा को सीता के दृष्टिकोण से व्यक्त करती यह कविता नारी की गरिमा, कर्तव्य और अंतर्मन के दर्द को सामने रखती है.

अग्निपरीक्षा, विरह और प्रतीक्षा की पीड़ा को सीता के दृष्टिकोण से व्यक्त करती यह कविता नारी की गरिमा, कर्तव्य और अंतर्मन के दर्द को सामने रखती है.
वर्तमान सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों पर प्रश्न उठाती यह ओजपूर्ण हिंदी कविता भारत के भविष्य को लेकर कवयित्री की चिंता और भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। कविता में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तनों पर चिंतन करते हुए भगवान राम से प्रतीकात्मक संवाद के माध्यम से अनेक सवाल पूछे गए हैं। यह रचना पाठकों को आत्ममंथन और विचार के लिए प्रेरित करती है।
अहिल्या की प्रतीक्षा के रूपक में लिखी यह कविता एक स्त्री के भीतर के पत्थर हो चुके दर्द और अधूरी चाहत की सजीव अभिव्यक्ति है।
यह कविता व्यक्ति के भीतर छिपे रामत्व को जागृत करने की प्रेरणा देती है। कवि ने राम, रावण, कुंभकर्ण, जटायु और गिलहरी जैसे प्रतीकों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। यदि हम अपने विवेक और संस्कारों को जगाएं, तो हम भी अपने जीवन में राम के आदर्शों को प्राप्त कर सकते हैं।
कविता मानवीय हृदय की उन गहरी इच्छाओं को प्रकट करती है जो भौतिक सुख-संपदा से परे, आत्मिक शांति और सच्चे प्रेम की खोज में हैं। कवि ने “प्रारम्भी नेह” में जीवन को एक ऐसे वन के रूप में देखा है जहाँ वह चंदन जैसी सुगंध और गुलशन जैसी सुंदरता चाहता है, परंतु उसे एहसास है कि धन और वैभव उसके साथ नहीं रहेंगे। इसलिए वह जीवन में सुर-संगम अर्थात् आत्मिक सामंजस्य की चाह रखता है।
श्रीराम को केवल एक राजा या नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श और जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें मन रमा रहे, जिन्हें हमने कभी गुना नहीं, जो समय के शिलालेख पर पावन धाम हैं — वही राम हैं। उनकी मर्यादित कर्त्तव्य-बोध और कूटनीति की सूक्ष्म समझ, जीवन के रण में उनकी जीत और हार, सागर पर उनका साहस, प्रेम और त्याग — सब उन्हें न केवल नायक बल्कि नयनाभिराम बनाते हैं। उनके कार्य और आचरण हमारे जीवन में संजीवनी और अनमोल निधि की तरह हैं।
हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।