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सुर संगम साथ मिले

नमिता गुप्ता ‘श्री’

सुखमय हो संसार वन चंदन चाहा।
रहे सलामत नजरों में गुलशन चाहा।।

धन वैभव ये साथ न जाने पाएगा।
सुर संगम साथ मिले जीवन चाहा।।

अपने होकर जो दिल से नही मिले।
मन से मन मिलने का दर्पन चाहा।।

अपनों ने काँटों से जख्मी कर डाला।
सुखद हसीन पलों का उपवन चाहा।।

जहाँ सभी निश्चित हो खेले खाए।
लौटा दो मासूम वो बचपन चाहा।।

और नहीं चाहा था कुछ मैंने तुमसे।
बस प्रीत भरा हृदय मधुबन चाहा।।

राम हमारे होकर भी सबके मानों।
द्वेष,दंभ से दूर ‘श्री’भगवन चाहा।।

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