संवाद और ख़्याल
आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।

आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।
यह रचना पूर्णिमा की रात के एक दुर्लभ दृश्य को माँ की लोकबोली से जोड़ती है। चाँद सिर्फ आकाशीय पिंड नहीं रह जाता, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और भाषा के स्नेहिल स्पर्श में बदल जाता है—जहाँ “पूर्णिमा” माँ के लिए “पुन्नो” बन जाती है।
गुड़ वाली चाय और मैं दोनों थोड़े देसी, थोड़े अनगढ़, पर पूरी तरह ईमानदार। जैसे गुड़ अपने रंग को धीरे-धीरे पानी में खोलता है, वैसे ही मेरी मिठास भी समय लेकर सामने आती है। सादगी में भी स्वाद छिपा होता है, यही हमें एक-दूसरे से जोड़ता है।
ओशो के डिस्कोर्स से औरत सेक्स में बहुत अधिक रुचि नहीं रखती। वह गर्माहट, गले लगाने, मित्रता और प्रेम में ज़्यादा रुचि रखती है। पुरुष अधिकतर सेक्स में रुचि रखते हैं। ये गलतफहमियाँ इस बात को दर्शाती हैं कि शायद भगवान ने दुनिया नहीं बनाई होगी — क्योंकि यहाँ कुछ भी मेल नहीं खाता। ऐसा…
कविता मानवीय हृदय की उन गहरी इच्छाओं को प्रकट करती है जो भौतिक सुख-संपदा से परे, आत्मिक शांति और सच्चे प्रेम की खोज में हैं। कवि ने “प्रारम्भी नेह” में जीवन को एक ऐसे वन के रूप में देखा है जहाँ वह चंदन जैसी सुगंध और गुलशन जैसी सुंदरता चाहता है, परंतु उसे एहसास है कि धन और वैभव उसके साथ नहीं रहेंगे। इसलिए वह जीवन में सुर-संगम अर्थात् आत्मिक सामंजस्य की चाह रखता है।
बहुत समय बाद उससे मिलकर मन को एक अजीब सुकून मिला। मैं उसे याद करता था जब वह बहुत छोटी थी — बिल्कुल गुड़िया जैसी। अब वह शादी-शुदा है, पति और बच्चे हैं, और एक खुशहाल जीवन जी रही है। यह देखकर मेरे चेहरे पर स्वाभाविक हँसी खिल उठी।
इतनी सम्पन्नता के बावजूद उसकी फितरत नहीं बदली है। उसकी सम्मोहक और उन्मुक्त हँसी, अविश्वसनीय सरलता और निहायत शालीनता आज भी बरकरार है। मैं सोचता हूँ कि कैसे वह उन मर्यादाविहीन लोगों से निपटती होगी, जो हमारे बीच निशंक घूमते हैं। ऐसे लोग अपने बीच होने पर यह भरोसा दिलाते हैं कि दुनिया आज भी सुन्दर है। उनकी मौजूदगी यह अहसास कराती है कि अच्छाई और बुराई की सतत लड़ाई में अंततः कौन जीतेगा, यह सुनिश्चित है।
हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।
यह कविता मानो खुशबुओं का एक जीवन वृत्तांत है। हर स्मृति, हर अनुभव एक विशेष सुगंध से जुड़कर अमर हो गया है। पहली बारिश की मिट्टी की महक, प्रियतम की मीठी बातों की महक, किताबों से उठती खुशबू, हाथों में महंदी की गंध, गहनों में समाया पसीना, खिड़की से आती रातरानी की महक और तन पर चंदन की सुगंध—सब कुछ उसके प्रेम और साथ के अनुभवों से गुँथा हुआ है। यह केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन अदृश्य अनुभूतियों का बयान है जो इंद्रियों से परे जाकर हृदय में स्थायी छाप छोड़ देती हैं। हर खुशबू, एक स्मृति बनकर जीती है और हर स्मृति में प्रेम की गहराई झलकती है।
यह कविता गहरे प्रेम और स्मृतियों की शक्ति को दर्शाती है। कवयित्री अपने प्रिय के अस्तित्व को अपनी स्मृतियों और प्रार्थनाओं में जीवित रखती है। उसका प्रेम इतना निष्ठावान है कि उसने किसी उद्देश्य या लक्ष्य की अपेक्षा नहीं की, केवल यह सुनिश्चित किया कि वह अपने प्रिय की खुशी और अस्तित्व का सम्मान करती रहे। कवयित्री अपने प्रेम को एक फल या कर्म के रूप में समर्पित करती है और इसे ईश्वर के माध्यम से पवित्र बनाती है।
माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।
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