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माँ का स्वरूप

प्रीति प्रधान, प्रसिद्ध लेखिका, भिलाई

शक्ति का रूप हो माँ तुम, ममता की मूरत,
आकाश सा विशाल हृदय, धरा का धीरज तुम में समाहित।

बिन मांगे सब देती हो, मांगूँ तो ना करती इंकार,
तेरे गुण गाऊँ मैं, अकिंचन, अज्ञानी बार-बार।

मेरे सुख में साथ रहो, दुख में हाथ थामो माँ,
ये जीवन है तुम्हारा, मेरी इक-इक साँस तुम्हीं से जुड़ा।

दिन-रात तुम्हारा ध्यान करूँ, हर पल तुम्हीं को देखूँ,
आँखों में बस जाओ माँ, पलकों पे सदा विराजो तुम।

तेरे चरणों में शीश झुका दूँ, अंत समय में दर्शन दे दो,
मेरे जीवन की बस यही प्रार्थना है, माँ, सदा साथ रहो।

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