सूर्योदय का शांत और ऊर्जा से भरा प्राकृतिक दृश्य

सूर्य वंदना

यह कविता प्रातःकालीन सूर्य की किरणों के माध्यम से प्रकृति के नवजीवन, ऊर्जा और जागृति का अत्यंत सुंदर चित्रण करती है। कवि ने मरीचि (सूर्य किरण) को समर्पित भावों के जरिए यह दर्शाया है कि किस प्रकार हर सुबह नई आशा, नई चेतना और सकारात्मकता लेकर आती है।

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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बहुत जी करता है

मैं जीना चाहती हूँ उन क्षणों को जब ब्रज में कृष्ण अपनी लीलाएँ रचते थे। नटनगर रास, बंसी की मधुर तान, गोपियों की हँसी और उनका अनन्य प्रेम—हर दृश्य हृदय में जीवंत हो उठता है। मैं देखना चाहती हूँ यशोदा मैया का लाल संग खेलना, सुदामा का स्नेह, और कान्हा की माखन चोरी। कभी-कभी लगता है कि यह भाव किसी पुराने युग की स्मृति है—शायद मैं भी कोई गोपी थी या ललिता जैसी सखी। मैं रुक्मिणी नहीं, बल्कि मीरा का विरह, राधा का अनन्य प्रेम और ब्रज की होली का उल्लास जीना चाहती हूँ।कृष्ण बनना सरल नहीं, पर उनके प्रेम में खो जाना—यही सबसे बड़ा सुख है।

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माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

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