दरिया और किनारा

कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।

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हलफनामा

पुरुष ने बड़ी कुशलता से मिट्टी और स्त्री में बीज बोने के अधिकार अपने अधीन कर लिए। उसने सब कुछ नियंत्रित किया, जिसमें स्त्री के मस्तिष्क का एक छोटा सा कोना भी शामिल था। दिखावे की रंगीन दुनिया में उसने बड़ी सफाई से अपना भार स्त्री के कंधे पर डाल दिया।

अब, जब स्त्रियों ने पुरुष सत्ता-कमान को कुशलता से संभाल लिया है, पुरुष तुरंत नए आदर्श स्थापित करने में जुट गया। अपराध भाव और जकड़न की स्थिति में विद्रोह की लौ को स्त्रियों ने सहजता से दबा दिया। यह धीरे-धीरे एक नए हलफनामे में तब्दील हो रहा है, जो बदलाव और संतुलन की दिशा में संकेत देता है।

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

श्रीराम को केवल एक राजा या नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श और जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें मन रमा रहे, जिन्हें हमने कभी गुना नहीं, जो समय के शिलालेख पर पावन धाम हैं — वही राम हैं। उनकी मर्यादित कर्त्तव्य-बोध और कूटनीति की सूक्ष्म समझ, जीवन के रण में उनकी जीत और हार, सागर पर उनका साहस, प्रेम और त्याग — सब उन्हें न केवल नायक बल्कि नयनाभिराम बनाते हैं। उनके कार्य और आचरण हमारे जीवन में संजीवनी और अनमोल निधि की तरह हैं।

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शिव शक्ति

शिव ही सत्य हैं और सत्य ही शिव हैं। उनकी पहचान सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के रूप में होती है। शिव ही शक्ति हैं और शक्ति ही शिव—दोनों एक ही माला के अनमोल मोती हैं जिनसे संपूर्ण विश्व आलोकित होता है। ब्रह्मा जी ने शिव की प्रेरणा से ही ब्रह्मांड की रचना की और विष्णु जी को सृष्टि के पालन का दायित्व भी शिव ने ही प्रदान किया। सृष्टि का संहार स्वयं शिव के हाथ में है। यही इस सृष्टि का सत्य है। परंतु सदाशिव का प्राकट्य कैसे हुआ—इसका प्रमाण शास्त्रों में नहीं मिलता, क्योंकि वे अनादि और अनंत हैं। त्रिकालदर्शी सदाशिव सबसे बड़े प्रशासक और प्रबंधक हैं, जो सबको उनके उत्तरदायित्व सौंपते हैं और सबके कार्य पर सतर्क दृष्टि रखते हैं। समय-समय पर समीक्षक बनकर और कभी तिर्यक दृष्टि से देखकर वे सभी की सहायता को तत्पर रहते हैं। वास्तव में शिव शब्दातीत और अवर्णनीय हैं—उनकी महिमा अपरंपार है। यही स्मरणीय है कि शंकर ही सदा सेवनीय हैं और वही सभी दुःखों का हरण करने वाले हैं।

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मां आदिशक्ति

यह कविता मां भवानी की आराधना और शक्ति की महिमा का उत्सव है। कवि मां को आदिशक्ति के रूप में पूजता है और उनके चरणों में शरण पाने की इच्छा व्यक्त करता है। कविता में यह दर्शाया गया है कि श्रद्धा और भक्ति से मां सभी संकटों को दूर करती हैं और जीवन में मंगल लाती हैं।
कन्या रूप में विराजित शक्ति, उनके चरणों से सुख-शांति और सामर्थ्य प्रदान करती है। दुर्गा अष्टमी जैसे पर्वों के माध्यम से मां का आशीर्वाद प्राप्त करने का महत्व भी उजागर किया गया है। कुल मिलाकर, यह कविता भक्ति, शक्ति, संरक्षण और आशीर्वाद का संदेश देती है।

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मातरानी के अनन्य स्वरूप

मातारानी की महिमा असीमित और अनन्य है। सृष्टि की हर क्रियाशीलता में उनका वंदन और पूजन होता है। दया, शांति, चेतना और सामर्थ्य के प्रतिरूप के रूप में, माँ ज्ञान से पूर्ण प्रकाशपुंज हैं। वह जीवन की सर्वशक्तिप्रदायिनी हैं, जो समस्त जगत की असुरी शक्तियों का संहार करती हैं और यश, रूप, आरोग्य व सौभाग्य प्रदान करती हैं।

माँ अमिय-स्रोत जैसी निरंतर नाद करती हैं और दुष्टों का दमन करने के लिए विकराल रूप धारण कर लेती हैं। प्रचंड दामिनी और रमा कामिनी के स्वरूप में वह भक्तों के हर संताप को हरती हैं और उनके मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।

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माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

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सृष्टि रचयिता : नारी      

नारी को अबला कहना उसके अस्तित्व के साथ अन्याय है। वह सृष्टि की रचयिता, संवेदना की मूरत और असीम शक्ति की प्रतीक है। धूप, सर्दी, गर्मी और जीवन के हर थपेड़े सहकर भी वह संसार में सौंदर्य और संतुलन भरती है। कभी दुर्गा, कभी चंडी, वह मानव जाति का अभिमान है। फिर भी इतिहास में सीता, द्रौपदी और गांधारी जैसी अनेक नारियां अन्याय सहने को विवश क्यों हुईं? क्या परिवार का संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है? सवाल यही है कि हर नारी रानी लक्ष्मीबाई या रानी दुर्गावती की तरह साहसी और प्रतिकार करने वाली क्यों नहीं बन पाती।

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कंक्रीट को तोड़कर उगता पीपल का पेड़ और आत्मविश्वास से खड़ी एक मजबूत महिला

जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।

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